भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बजत नूपुर पगन हँसत दोउ लसत दिये गरेबाहीं ॥ बढ़ी
निशि शर्दकी कौन वर्णनकरै शेशहू सहसमुख रहे थकाई । कहै
चरणदास शुकदेव किरपा करी ध्यान के माहिं लीला दिखाई ॥
दो० बसरी बैरन बांसुरी, तूही ब्रजके माहिं।
लगीरहत पियमुख जुतू, पलछिन छांड़त नाहिं ॥
जब तू बाजत तानसूं, ए बंशी बड़भाग ।
कसक उठत जियरा जरै, तनमन लागत आग ॥
हमरो पिय तैं वशकियो, करत अधर रसपान ।
कहा टोना कियो जु तैं, बर पाये भगवान ॥
ब्रह्मा भूलो वेदधुनि, शंकर छोड़ो ध्यान ।
चरणदास कहैंसुनिबांसुरी, इन्द्र तज्यो अभिमान ॥
छैल छबीलो लाड़िलो, रंग रँगीलो लाल ।
चरणदास के मन बसो, बंशीधर गोपाल ॥
राग काफी ॥
मोहन प्यारे की बंशी बाजैरी ।
हमकूं जरावत विरह अग्निसों जब अधरनपै राजैरी ॥
लालन मुख लागीरहै निशिदिन नेकन नाहिं न लाजैरी ।
तनक बाँस की बनी बसुरिया गर्भभरी अति गाजैरी ॥
तैं वश कियो शुकदेव हमारो सुनत कलेजो दाझैरी ।
चरणदास कहैं अब कहा कीजै तुही भई सिरताजैरी ॥
बंशीवारे सों नेहरा कीन्होरी ।
काहूको कछु कहो न मानूं यह तनमन वहि दीन्होरी ॥
भर्मत भर्मत बहुतै हारी भटक भटक जग बीनोरी ।
आन देवसों काज न मेरो सांचो प्रीतम चीन्होरी ॥
शोभाको सागर गुणको आगर कुँवरकिशोर नवीनोरी ।