भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें·शब्दवर्णन । ३५५
पढ़न लिखन सब नामहैरी अरी हेली नाम ग्रह सब देव ।
जो कुछ है सो नामहीं नाम हमरो भेव ॥
राम नाम शुकदेव दियोरी अरीहेली सों राखो मनमाहिं ।
चरणदास के नामहीं इह सम तुल कछु नाहिं ॥
अथ सगुण उपासना अंग राग शब्दों के दोहा ॥
धन सतगुरु शुकदेवजी, मेरी करी सहाय ।
निज वृन्दावन धामको, लीला दई दिखाय ॥
अब कछु कौतुक रासको, वरणतहै चरणदास ।
लाल लाड़िली कृपा सों, पाव निज ब्रजवास ॥
राग रासविहागरा ॥
नृत्य करत छविसों बनवारी ।
टेरिलई सबही ब्रज वनिता मुरली मधुर बजाय विहारी ॥
सुनत श्रवण धुनिहोय प्रेमवशविकलभइँ सुन्दर सुकुमारी ।
गृहके काज लाज तजि पियकी उठि धाई तन सुरति बिसारी ॥
आयेगावन छहों रागमिलि पांच पांच इक इककी नारी ।
आठ आठ इक इकके बेटा मूरतवन्त स्वरूप महारी ॥
ताल वीण मुरचंग मँजीरा तनन तनन तँबुरा गति न्यारी ।
ताधीनाधीना ताधीना बजत पखावज घुंघुरू झनन झनन झन-
कारी ॥ इक इक गोपियनके संग इक इक सुन्दर भेष धरो
गिरधारी । ऐसोरच्यो रासको मण्डल मध्यराधिका कृष्ण
मुरारी ॥ गावत गीत बढ़ाय परस्पर मान करत पियसों पिय
प्यारी । लेत मनाय लाड़िलो प्यारो हँसि हँसि विहरत दै
दै तारी ॥ ततथेई ततथेई थेइ थेइ ततथेई उरप तुरप सांगीत
उचारी । नटवररूप करो मनमोहन शेषथको वरणत शोभारी ॥
भये चकित सुरमुनि ऋषि किन्नर बाढ़ी रैन शरद उजियारी ।