भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३४३
चरणदास शुकदेव कहत हैं निजकरि मूल गहीजै ।
पारब्रह्म जिन सृष्टि उपाई ताओरी चितदीजै ॥
राग बिलावल ॥
नमो नमो श्रीरामजी देवनके देवा ।
शिव नारद सनकादिलौं कोइ लहै न भेवा ॥
एजी निरगुणसों सरगुण भये कौतुक विस्तारे ।
साधुन की रक्षा करी दानव दल मारे ॥
दसरथसुत भूले कहें कोई जानत नाहीं ।
इकशत अंड दिखाइया अपने मुख माहीं ॥
गौराने परचो लियो सियभेष बनायो ।
देखे रूप अनन्तही जब मन बौरायो ॥
आदि निरंजन एक तू दूजा नहिं कोई ।
शुकदेव कहीं चरणदासको नित सुमिरौ सोई ॥
नमो नमो गोविन्दजी हूं दास तिहारी ।
चौरासी दुख सब हरो आवागमन निवारो ॥
कर्मनको प्रेरो फिरूं नहिं पायो नेरो ।
अबके ऐसी कीजिये दीजै चरणबसेरो ॥
पतितउधारण तुम सुने वेदन में गाये ।
अजामील गणिका तरे ले पार लगाये ॥
एजी गुरु शुकदेव बताइया गही तुम्हारी आसा ।
आन धर्मको छोड़िकै भयो चरणहिंदासा ॥
राग जैजैवन्ती ॥
आदितौ सनातन सोई अज अविनाशी है साईं ॥ जाको
नहिंवारपार निर्गुणको तत्त्वसार तासों भयो जग सब आप
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