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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 690 में से

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पृष्ठ 386

शब्दवर्णन । ३४७
राग हिंडोलनो ॥
झूलत हरिजन सन्तभक्ति हिंडोलने ।
ररा ममा दृढ़खंभ रोपे प्रेम डोरी लाय ।
टेक पटरी बैठि सजनी अतिअनन्द बढ़ाय ॥
ध्यानके जहाँ मेघ बरसें होय उमँग हुलास ।
गुरुमुखी जहाँ समझ भीजैं पूरण हरिके दास ॥
बुद्धि विवेक विचारि गावैं सखी सहेली साथ ।
अगमलीला रटैं सजनी जहां ब्रह्मविलास ॥
परमगुरु श्रीजनक झूलैं झूलैं गुरु शुकदेव ।
चरणदासी सखी सदा झूलैं कोइ न पावै भेव ॥
राग हेली ॥
और न मेरे कोय हेली ।
प्राणपियारे लालजी ॥ रोम रोमरोम वेई रमेरी अरी हेली तन
मन व्यापक सोय ॥ जित देखों तित लालकोरी अरी हेली दूजा
नाहीं और ॥ आदि अन्त है लालजी सर्वमयी सबठौर ॥
देश काल सबलालहैं री अरी हेली अर्धऊरध है लाल । दहिने
बायें लालजी दशोंदिशा में लाल ॥ सोवतही में लालहैं री
अरी हेली जाग्रतहीमें लाल । माहिं सुषोपति लालजी तुरियाही
में लाल ॥ ज्ञान ध्यान सब लाल हैंरी अरी हेलीलालही गुरु शुकदेव
चरणदासी है लालकी बिरला जानै भेव ॥
जो होवै हो हरिदास हेली एते कुलतारै वही ॥ फल न
मुक्तिचाहै नहींरी अरी हेली भक्ति करै निर्वास ॥ बीस चार कुल ददा
केरी अरी हेली बीस नाना के जान । सोलह कुल ससुरारके
द्वादश सुता बखान ॥ बहनी के ग्यारह तरेरी अरी हेली दश
भूवा के पार । मौसी के कुल आठही वेद कहत हैं चार ॥ अष्टादश