भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन । ३२३
जिनके हाथ परो जिय मेरो घेरा घेरी बहु दुख पायो ॥
एकघरी मोहिं छोड़त नाहीं लहरि चढ़ायकै बहुत नवायो ।
कपि ज्यों घर घर द्वार नचावै उत्तम हरिको नाम छुटायो ॥
अबके शरणि गही है तुम्हरी चरणहिंदास अयाने ।
किरपा करि यह व्याधि छुटावो गुरु शुकदेव सयाने ॥
राग धनाश्री ॥
अब मैं सतगुरु शरणै आयो ।
बिन रसना बिन अक्षर बाणी ऐसोहि जाप सुनायो ॥
काम क्रोध मद पाप जराये त्रिबिधि ताप नशायो ।
नागिनि पांच मुई सँग ममता दृष्टिसूं काल डरायो ॥
किरिया कर्म अचार भुलाना ना तीरथ मग धायो ।
समझौ सहज बचन सुनि गुरु के भर्म को बोझ बगायो ॥
ज्यों ज्यों जपूँ गरकहौं वामें वह मों माहिं समायो ।
जग झूंठो झूंठो तन मेरो यों आपा नहिं पायो ॥
वाकूं जपै जन्म सोइ जीतै सोहम् शुद्ध बतायो ।
चरणदास शुकदेव दया यों सागर लहर समायो ॥
राग सोरठ ॥
गुरुदेव हमारे आवो जी ।
बहुत दिनों से लगी उमाहो आनंद मंगल लावोजी ॥
पलकन पंथ बहारूं तेरो नैनन परि पग धारोजी ।
बाट तिहारी निशिदिन देखूं हमरी ओर निहारोजी ॥
करौं उछाह बहुत मन सेती आंगन चौक पुरावोंजी ।
करूं आरती तन मन वारूं बारबार बलिजावोंजी ॥
दे परिक्रमा शीश नवाऊं सुनि सुनि बचन अघाऊंजी ।
गुरु शुकदेव चरणहूंदासा दर्शन माहिं समाऊंजी ॥
३२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
हो अँखियाँ गुरु दर्शन की प्यासी ।
इकटक लागी पंथ निहारूं तनसूं भई उदासी ॥
राति दिना मोहिं चैन नहीं है चिन्ता अधिक सतावै ।
तलफतरहूँ कल्पना भारी निश्चल बुधि नहिं आवै ॥
तन गयो सूख हूक अति लागी हिरदय पावक बाढ़ी ।
खिनमें लेटी खिनमें बैठी घर अँगना खिन ठाढ़ी ॥
भीतर बाहर संग सहेली बात नहीं समझावैं ।
चरणदास शुकदेव पियारे नैनन ना दर्शावैं ॥
राग भैरव ॥
गुरु बिन मेरे और न कोय । जग के नाते सब दिये खोय ॥
गुरुही मातु पिता अरु वीर । गुरुही सम्पति जीव शरीर ॥
गुरुही जाति वरण कुल गोत । जहां तहां गुरु संगी होत ॥
गुरुही तीरथ बरत हमार । दीन्हे और धरम सबडार ॥
गुरुही नाम जपौं दिन रैन । गुरुको ध्यान परम सुख दैन ॥
गुरु के चरण कमलकर वास । और न राखूं कोई आस ॥
जो कुछ चाहें गुरुही करें । भावै छाँहँ धूप लै धरैं ॥
आदिपुरुष गुरुही कूं जानूं । गुरुही मुक्तीरूप पिछानूं ॥
चरणदास के गुरु शुकदेव । और न दूजा लागै लेव ॥
अथ भक्तिअंग वर्णन राग करखा ॥
राखिये लाज महाराज गोपालजी दीनजन शरण आयो
तिहारी । लगो मोहि ध्यान दृढ़ चरण ही कमल में कीजिये
किरपा सुनिहो बिहारी ॥ विषय जंजार रस स्वाद घेरो
घनो पांचहूं चोर दुख देहिं भारी । नीच बहु दुष्ट बलवान
ठग तकैं निसि द्यौस हिये घात डारी ॥ पकरि गज-
' शब्दवर्णन । ३२५
राज कूं ग्राह खैंच्यो तबै टेरदे हेर कीन्ही पुकारी । गरुड़ तजि
धाय आये छुटायो तुरत हरि हिये ब्याधि तनु बिपति डारी ॥
ध्रुव अचल कियो प्रहादकूं दर्श दियो दास हनुमानसूं प्रीति
भारी । भीलनी अरु कामी अजामील से अधम अति पतित
गणिका उबारी ॥ पाण्डुसुतहूँ बचाये जरत अग्निसूं द्रौपदी
चीर बाढ़ो अपारी । नामदेव सैन पीपा कबीरा सदन नरसिया
दासिमीरा उधारी ॥ कोटि अनगिन भक्त तारि दिये तनक
मैं कहो मेरी सुरति क्यों बिसारी । तो बिना कहां जाऊँ कहीं
ठौर ना तेरेही द्वार कोहूँ भिखारी ॥ सकल संशय हरण तूही
तारणतरण श्याम शुकदेव गिरिधर मुरारी । दास चरणदास
को आसरो तुही है आपनो जानलीजै सँभारी ॥१॥ साधौ सोई
जनशूर जो खेत में मड़रहै भक्ति मैदान में रहै ठाढ़ो । सकल
लज्जा तजै महा निरभै गजै पैज नीशान जि आय गाड़ा ॥
भये बहुबीर गम्भीर जे धीर मत सबन को यश कहत ग्रन्थ
होई । तिनविषे कछू इकनाम वर्णन करूं सुनौ हो सन्तदै
चित्त सोई ॥ पितासूं रूठि ध्रुव पांचही वर्षकौ टेक गहि भक्ति
के पन्थ धायो । छल भयो ना डिगो टेक पूरी भई जीति
मैदान हरि दर्श पायो ॥ हठो प्रहाद हरिनाम छाँड़ो नहीं
बापने त्रासदै बहु डिगायो । टेक जब ना टरी राम रक्षाकरी
दुष्ट को मारिक जन जितायो ॥ कबीर दादू धने पहिरि
बख्तर बने नामदेव सारिखे बहुत कूदे । सेन सदना बली भक्त
पीपा बड़ो रामकी ओरकूं चले सूधे ॥ मलूक जैदेव गज ग्राह
कलँगी धरे शूर रैदास मुख नाहिं मोड़ा । ध्यान बन्दूक में
प्रेम रञ्जकजमा मीरमाधो चला कुदाय घोड़ा ॥ दासमीरा
पिली प्रेम सम्मुख चली छोड़ि दई लाजकुल नाहिं माना ।
३२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और शबरी मंडी तोड़ि ऊँचीगढी दौर करमाचली प्रेम जाना ॥
श्रीशुकदेव रणजीत सांवत कियो लड़े कलियुग बिषे खम्भ
गाड़े । बहुत सेना लिये ललक हूहू किये चरणहींदास सँग
नाहिं छांड़े ॥
राग काफी ॥
हे जगके करतार तेरी कहा अस्तुति कीजै ।
तूही एक अनेक भयो है अपनी इच्छाधार ॥
तूही सिरजै तूही पालै तूही करै संहार ।
जितदेखूं तित तूही तूहै तेरा रूप अपार ॥
तूही रामनरायण तूही तूही कृष्ण मुरार ।
साधौं की रक्षाके कारण युग युग ले अवतार ॥
तुही आदि अरु मध्य तुही है अन्ततेरा उजियार ।
दानव देव तोहीसूं प्रगटे तीनलोक बिस्तार ॥
जल थल में व्यापक है तूही घटघट बोलनहार ।
तोबिन और कौन है ऐसो जासों करों पुकार ॥
तूही चतुर शिरोमणि है प्रभु तूही पतित उधार ।
चरणदास शुकदेव तुही है जीवन प्राणअधार ॥१॥
तव गुण करूं बखान यह मेरी बुद्धि कहां है ।
चतुर्मुखी ब्रह्मा गुण गावैं तिनहुँ न पायो जान ॥
गण गावत शंकर जब हारे करनेलागे ध्यान ।
गुण अपार कछु पार न पायो सनकादिक कथज्ञान ॥
गण गावत नारदमुनि थाके सहसमुखनसूं शेष ।
लीला को कछु वार न पारा ना परिमाण न भेश ॥
शक्ति घनी अनगिनत तुम्हारी बहुरूप बहुनावँ ।
जबहिं बिचारूं हियेमें हरूं अचरज हेरि हिरावँ ॥
शब्दवर्णन । ३२७
अति अथाह कछु थाह न पाऊं सोच अचक रहिजावँ ।
गुरु शुकदेव थके रणजीता मैं कछु कौन कहावँ ॥
राग पर्ज ॥
रामगुण कोई न जानेहो ।
शेष महेश गणेश अरु ब्रह्मा रहे थकानेहो ॥
सुरति निरति बुधिगम नहीं सबदेव भुलानेहो ।
सनकादिक नारदहू हारे कौन बखानेहो ॥
योगी जंगम ऋषि मुनि तपसी सुर ज्ञानेहो ।
ध्यान लगावें अन्त न पावें गये हिराने हो ॥
पशु मनुष कहा कहिसकै विषय रस लपटानेहो ।
चरणदास शुकदेव दया यह बात पिछाने हो ॥
राग काफी ॥
रामा रामा जी साइ ॥
अलख निरंजन रूपा । तूही एक अनेक स्वरूपा ॥
तेरी ज्योति सकल जगछाई । तू घटघट रहो समाई ॥
तूही आदि अनादि कहावै । ब्रह्मादिक पार न पावै ॥
अबिगत अविनाशी जाना । निरगुण सरगुण पहिंचाना ॥
बहु बिधि के भेष बनावै । सिरजै पालै बिनशावै ॥
अचरज कौतुक बिस्तारा । जनकारण ले अवतारा ॥
तूही है देवनको देवा । सनकादिक लहैं न भेवा ॥
चाहै सो करै पलमाहीं । तूही व्यापक है सब ठाहीं ॥
तूही ज्ञानी गुणी अपारा । पूरण परमातम प्यारा ॥
गुण बहुत कहांलौं गाऊं । बिनती करि शीश नवाऊं ॥
शुकदेव गुरू बतलाया । चरणदास शरण तेरी आया ॥
रामारामाजी टे० सुनिलिजै बिनती मेरी । मैं शरण गही है तेरी ॥
२३
३२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तैं बहुतै पतित उधारे । भवजलसूं पार उतारे ॥
हौं सब को नाम न जानूं । अब कोइ कोइ भक्त बखानूं ॥
अँबरीष सुदामा नामा । सो पहुँचाये निजधामा ॥
ध्रुव पांच बरष को बाला । तेहि दर्शन दियो गोपाला ॥
प्रह्लाद टेक तुम राखी । यों जानत हैं सब साखी ॥
शबरी के फल तुम खाये । त्रयलोचन के घर आये ॥
पांडवन की करी सहाई । द्रौपदी की लाज बचाई ॥
गणिकाहू पार लगाई । करमा की खिचरी खाई ॥
मीरा तुम्हारे रंग भीनी । नरसी की हुंडी लीनी ॥
धन्नाको खेत जमायो । तैं साग विदुर घर पायो ॥
कबिराके बादल लाये । सब काज किये मनभाये ॥
सदना से सेना नाई । तैं बहुत किये मुकताई ॥
ग्राहसुं गज जाय छुटायो । तैं मोकूं क्यों बिसरायो ॥
सनकादिक ब्रह्मा ध्यावैं । तेरा शेश आदि यश गावैं ॥
तेरा वेद पार नहीं पाया । जिन नेति नेति बतलाया ॥
मैं काम क्रोध ने घेरा । ममता की उर उरझेरा ॥
मोह लोभ के फन्दे फरिया । तेरा नाम बिसरि दुखभरिया॥
अब तुम्हीं करो निबेरा । मोहिं जानि चरणकों चेरा ॥
मैं पापी महा सन्तापी । अपराधी बहुत कलापी ॥
तुमै छाँड़ि कासुपै जाऊं । यह दुख कौने समझाऊं ॥
शुकदेव गुरू मैं पाया । जिन तेराही नाम बताया ॥
चरणदास आपनो कीजै । मोहिं भक्तिदान बर दीजै ॥
राग रामकली ॥
पतित उधारण बिरद तुम्हारो ।
जो यह बात सांच है हरिजी तौ तुम हमको पार उतारो ॥
शब्दवर्णन । ३२६
बालपने अरु तरुण अवस्था और बुढ़ापे माहीं ।
हम से भई सभी तुम जानौ तुम से नेकहु छानी नाहीं ॥
अनगिन पाप किये मनमाने नखशिख अवगुण धारी ।
फिरि फिरिकै सुनिशरणै आयो अब तुमको है लाज हमारी ॥
शुभकरमन को मारग छूटो आलस निद्रा घेरो ।
एकहि बात भली बनिआई जग में कहायौं तेरो चेरो ॥
दीनदयालु गुपाल बिश्वंभर श्रीशुकदेव गुसाईं ।
जैसे और पतित घनतारे चरणदास की गहिये बाहीं ॥
अर्ज सुनौ जगदीश गुसाईं ।
ग्रह नक्षत्र देव बिसारे चरण कमल की आयो छाई ॥
सत बिश्वास यही हिय धारो तोहि न भूलों एक घरी ।
इतउत से मन खैंचि लियो है काहू से कछु नाहिं सरी ॥
अब चाहो सो करो प्रभु तुम्हीं द्वार तुम्हारे सुरति अरी ।
भावै नरक, स्वर्ग पहुँचावो भावै राखौ निकट हरी ॥
अपनी चाहरही नहिं कोई जबसूं तुम्हरी आश धरी ।
आन भरोसो छोड़ि दियो है सकल बिकल सब प्यारकरी ॥
यह आपा तुम्हीं को दीनो मेरी मो मैं कुछ न रही ।
आदि पुरुष शुकदेव सुनोजी चरणदास यह टेरि कही ॥
राग बिभास ॥
अबकी करो सहाय हमारी ।
दुष्टदलन अरु भक्तबचावन ऐसी साखि तुम्हारी ॥
जन प्रह्लाद असुर गहि बांध्यों लीन्हो खङ्ग निकारी ।
हिरणाकुश हनि दास उबारो नरसिंह को तनु धारी ॥
खैंचि ग्राह गज बोरन लागो राम कह्यो इकबारी ।
३३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुनत पुकार पयादेहि धाये तजिकै गरुड़ सवारी ॥
द्रौपदि लाज उतारण कारण लाये सभा मँझारी ।
दीनानाथ लई सुधि वेगहि बाढो चीर अपारी ॥
जिन जिन शरण गही संकट में कहा पुरुप कहा नारी ।
चारो युग हरि करी सहाई रक्षक भये मुरारी ॥
गुरु शुकदेव बतायो तोंकों सन्तन कौ रखवारी ।
चरणदास थकि द्वारे तेरे गुण पौरुष दिये डारी ॥
राग धनाश्री ॥
अब तुम करो सहाय हमारी ।
मन के रोग होय गये दीरघ तन के बड़े विकारी ॥
तुम सो बैद और को दूसर जाहि दिखाउं नारी ।
सजीवनमूल अमर हो जासों सोहै दया तुम्हारी ॥
क्रिया कर्म की औषधि जेती रोग बढ़ावनहारी ।
दीजै चूर्ण ज्ञान भक्ति को मेटो सकल व्यथारी ॥
जन के काज पयादे धावत चरणकमल पर वारी ।
मैं भयो दास अधीन तुम्हारो मेरी करो सँभारी ॥
जो मोहिं कुटिल कुचील जानिकै मेरी सुरति विसारी ।
चरणदास शुकदेव तुम्हारो दुष्ट हँसेंगे भारी ॥
हरिजी संकट वेगि निवारो ।
जनकूं भीर परी है भारी चक्र सुदर्शन धारो ॥
कंसनिकंदन रावणगंजन हिरणाकुश गहि मारो ।
दुष्टदलन अरु भक्तउबारन जन प्रह्लाद उबारो ॥
पांचो पाण्डव राख लिये हैं कौरव दल संहारो ।
जिन जिन द्वेष कियो सन्तन सों सो सोई हनि डारो ॥
निरभय भक्ति करें जन तेरे ऐसो समय बिचारो ।
शब्दवर्णन ३३१
चरणदास के घट में बैरी तिनको क्यों न बिदारों ॥
राग बिभास ॥
राखो जी लाज गरीबनवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारे सबही बिगरैं काज ॥
भक्तबछल हरिनाम कहावो पतिउधारणहार ।
करो मनोरथ पूरण जन के शीतल दृष्टि निहार ॥
तुम जहाज मैं काग तिहारो तुम तजि अन्त न जाऊँ ।
जो तुम हरिजी मारि निकासो और ठौर नहिं पाऊं ॥
चरणदास प्रभु शरण तिहारी जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तिहारी तुम्हूँ देखि बिचार ॥
राग बिलावल ॥
प्रभुजी शरण तिहारी मैं आयो ।
जो कोइ शरण तिहारी नाहीं भर्मि-भर्मि दुख पायो ॥
औरन के मन देवी देवा मेरे मन तुहि भायो ।
जबसों सुरति सँभारी जग में और न शीश नवायो ॥
नरपति¹ सुरपति² आश तिहारी यह सुनकरि मैं धायो ।
तीरथ बरत सकल फल त्यागे चरणकमल चितलायो ॥
नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरोही ध्यान लगायो ।
आदि अनादि जुगादि तेरो यश वेद पुराणन गायो ॥
अब क्यों न बांह गहो हरि मेरी तुम काहे बिसरायो ।
चरणदास कहैं करता तूंहीं गुरु शुकदेव बतायो ॥
राग केदारा ॥
अबकी तारिहौ बलबीर ।
चूक मोसों परी भारी कुबुधि के संगसीर ॥
१ मनुष्य का राजा २ इन्द्र ॥
३३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भवसागर की धार तीक्ष्ण महागँधीलो नीर ।
काम क्रोध मदलोभ भँवर में चित न धरत तहां धीर ॥
मच्छ जहां बलवन्त पांचौ थाह गहर गँभीर ।
मोह पवन झकोर दारुण दूर पैलौतीर ॥
नाव तौ मँझधार भरमी हिये बाढ़ी पीर ।
चरणदास कहै कोई नाहिं संगी तुम बिना हरिहीर ॥
राग सोरठ ॥
अब जगफंद छुटावोजी हूँ तौ चरणकमल को चेरो ।
परो रहूं दरबार तिहारे संतन माहिं बसेरो ॥
बिना कामना करूं चाकरी आठौं पहरेनेरो ।
मनसब भक्ति क्रिपा करि दीजै मोहिं यही बहुतेरो ॥
खानेजाद कदीमी कहियो तुही आसरो मेरो ।
झिड़क बिड़ारौ तऊ न छांडौ सेवा सुमिरण तेरो ॥
काहू और आन देवन सों रहो नहीं उरझेरो ।
जैसे राखो त्योंही रहहूं कर लीजौ सुरझेरो ॥
तेरे घर बिन कहूं न मेरो ठौर ठिकानो डेरो ।
मोसे पतित दीन को हरिजी तुम्हीं करो निबेरो ॥
गुरु शुकदेव दयाकरि मोकूं ओर तिहारी फेरो ।
चरणदास को शरणै राखो यही इनाम घनेरो ॥
राग बिलावल ॥
तुम साहब करतार हो हम बन्दे तेरे ।
रोम रोम गुनहगार हैं बकसो हरि मेरे ॥
दशों दुवारे मैल है सब गन्दम गन्धा ।
उत्तम तेरो नाम है बिसरे सो अन्धा ॥
गुणतजिकै अवगुणकिये तुमसबपहिंचानौ ।
शब्दवर्णन ३३३
तुम सों कहा छिपाइये हरि घट घट की जानौ ॥
रहमकरो रहमान तू यह दास तिहारो ।
भक्तिपदारथ दीजिये आवागवन निवारो ॥
गुरुशुकदेव उबारलौ अब मेहर करीजै ।
चरणहिंदास गरीब को अपना करलीजै ॥
राग रामकली ॥
चारिबरण सों हरिजन ऊंचे ।
भये पवित्र हरि के सुमिरे तनके उज्ज्वल मनके सूचे ॥
जोन पतीजै साखि बताऊं शबरी के झूठे फल खाये ।
बहुत ऋषीश्वर ह्वांइरहते तिनके घर रघुपति नहिआये ॥
भीलनी पाँव दियो सरिता में शुद्धभयो जल सब कोई जाने ।
मन्दहतो सो निर्मल हूवो अभिमानी नरभये खिसाने ॥
ब्राह्मण क्षत्री भूपहुते बहु बाजो शङ्ख श्वपच जब आयो ।
बालमीकि यज्ञ पूरण कीन्हो जयजयकार भयो यश गायो ॥
जाति बरण कुल सोई नीकौ जाके होय भक्ति परकास ।
गुरु शुकदेव कहत हैं तोको हरिजन सेव चरणहीदास ॥
सब जातिनमें हरिजन प्यारे ।
रहनी तिनकी कोई न पावै तनसों जग में मनसों न्यारे ॥
साखि सुनौ अँबरीष भूप की दुर्बासा जहँ आयो ।
लगो शराप देन राजाको चक्रसुदर्शन जारन धायो ॥
प्रभुजी आये दुर्योधन के वह मनमें गरबायो ।
नाना बधिके ब्यंजन त्यागे साग बिदुर घर रुचिसों पायो ॥
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग मान सन्त को राखो ।
भक्तों वश भगवान सदाहीं वेद, पुराणन में यों भाखो ॥
३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र घर कहीं होय क्यों न बासा ।
धनिकुल वह शुकदेव बखाने यह तुम सुनौ चरणहीदासा ॥
राग कान्हरा ॥
धनि वे नर हरिदास कहाये ।
रामभक्ति दृढ़हीकरि पकरी आन धर्म सबही बिसराये ॥
आठपहर गलतान भजन में प्रेममगन हिय में हुलसाये ।
आप तरै तारै औरनको बहुतक पापी पार लगाये ॥
प्रभु दर्शन बिन और न आशा धर्म्मकाम अरु मोक्ष न चाहै ।
आठो सिद्धि फिरें सँग लागी नेक न देखें नैन उठाये ॥
तिनको ऋषिमुनि जापकरत हैं हरिजन हरिदोउ सँगहीगाये ।
ऊंची पदवी इन्द्रहुते देवन देखि अधिक ललचाये ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा धनि माता ऐसे जन जाये ।
जीवत शोभाजग में पाई तन छूटे हरि माहिं समाये ॥
राग सोरठा ॥
मोको कछु न चहिये राम ।
तुम बिन सबही फीके लागैं नाना सुख धन धाम
आठ सिद्धि नौनिद्धि आपनी और जननको दीजै ।
मैं तौ चेरो जन्म जन्मको निजकरि अपनो कीजै ॥
स्वर्ग फलनकी मोह न आशा ना वैकुंठ न मोक्षहि चाहूँ ।
चरणकमल के राखौ पासा
यहउरमाहिंउमाहूँभक्तिनछांडौंमुक्तिन मांगौंसुनुशुकदेवमुरारी
चरणदास की यही टेक है तजौं न गैल तुम्हारी ॥
राग भैरव ॥
वह पुरुषोत्तम मेरा यार । नेह लगा टूटै नहिं तार ॥
तीरथ जाऊं न बर्त्त करूं । चरणकमल को ध्यान धरूं ॥
शब्दवर्णन । ३३५
प्राण पियारे मेरेहि पासा । बन बन माहिं न फिरूं उदासा ॥
पढूं न गीता वेद पुरान । एकहि सुमिरौं श्रीभगवान ॥
औरनको नहिं नाऊं शीश । हरिही हरि हैं बिस्वेबीश ॥
काहूकी नहिं राखूं आस । तृष्णा काटि दही है फाँस ॥
उद्यम करूं न राखूं दाम । सहजहि ह्वै रहै पूरणकाम ॥
सिद्धि मुक्तिफल चाहौं नाहिं । नितहि रहूँ हरि संतन माहिं ॥
गुरु शुकदेव यही मोहिं दीन । चरणदास आनँद लवलीन ॥
यों कहैं हरिजी दयानिधान । सन्त हमारे जीवनप्रान ॥
सन्त चलैं जहाँ सँगही जावँ । सन्त दियो सो भोजन खावँ ॥
सन्त सुलावैं जितरहूँ सोय । सन्त बिना मेरे और न कोय ॥
सन्त हमारे माई बाप । सन्तहि को मनराखूं जाप ॥
सन्तको ध्यान धरौं दिनरैन । सन्त बिना मोहिं परै न चैन ॥
सन्त हमारी देही जान । सन्तहिं की राखूं पहिंचान ॥
सन्तकी सकल बलइया लेवँ । सन्त कूं अपनो सर्वस देवँ ॥
संतहिहेत धरूं अवतार । रक्षाकारण करूं न बार ॥
[
३३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परमेश्वर मिलनेकी लहरैं इक आवै इक जावै ।
कहैं शुकदेव चरणहीं दासा हरिहू कंठ लगावै ॥
राग विलावल ॥
हमारे चरणकमल को ध्यान ।
मूरख जगत भर्मता डोले चाहत जल अस्नान ॥
सब तीरथ वाही सों प्रकटे गंगा आदिक जान ।
जिन सेवन सब पातक नाश नितहोवै कल्यान ॥
साकत गिरही बानेधारी हैं सब ही अज्ञान ।
हरिसो हीरा छांड़िदियो है पूजे कांच पखान ॥
हरि चरण की महिमा जानैं हैं वे सन्त सुजान ।
भौंदू नर मायाके चेरे इनको कहा पहिंचान ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दीन्हों अंजन ज्ञान ।
साँचो प्रीतम सूझ परो है बिसरिगयो सब आन ॥
राग नट व विलावल सारंग ॥
हमारे रामभक्ति धनभारी ।
राज न डांडै चोर न चोरै लूटि सकै नहिं धारी ॥
प्रभु पैसे अरु रामरुपइये मुहर मुहब्बत हरिकी ।
हीराज्ञान युक्तके मोती कहा कमी हां ज़रकी ॥
सोना शील भँडार भरे हैं रूपा रूप अपारा ।
ऐसी दौलत सतगुरु दीन्हीं जाका सकल पसारा ॥
बाँटों बहुत घटै नहिं कबहूं दिन दिन ज्यौढ़ी ज्यौढ़ी ।
चोखा माल द्रव्य अति नीका बट्टा लगै न कौड़ी ॥
साह गुरू शुकदेव विराजैं चरणदास बन जोटा ।
मिलि मिलि रंक भूप हो बैठै कबहूँ न आवै टोटा ॥
शब्दवर्णन । ३३७
राग नट वा बिलावल ॥
जो नर हरि धनसों चितलावै ।
जैसे तैसे टोटा नाहीं लाभ सवायापावै ॥
मन करि कोठी नाव खजानो भक्तिदुकानलगावै ।
पूरा सतगुरु सांझी करिकै संगति वणिज चलावै ॥
हुंडी ध्यान सुरतिलै पहुंचै प्रेम नगरके माहीं ।
सीधा साहूकारा सांचा हेर फेर कछु नाहीं ॥
जित सौदागर सबही सुखिया गुरुशुकदेव बसाये ।
चरणहिंदास बिलमि रहे हाई जूनी पन्थ न आये ॥
राग देवगन्धार ॥
मनुवाँ राम के व्यौपारी ।
अबकै खेप भक्तिकी लादी वणिज कियो तैं भारी ॥
पांचौ चोर सदा मग रोकत इनसों कर छुटकारी ।
सतगुरु नायक के सँग मिलि चल लूट सकै नहिं धारी ॥
दो ठग मारग माहिं मिलेंगे एक कनक इक नारी ।
सावधानहो पेच न खइयो रहियो आप सँभारा ॥
हरिके नगर में जा पहुंचौगे पैहौ लाभ अपारी ।
चरणदास तोको समझावै रामन वारंवारी ॥
राग सोरठ ॥
हरि पावनकी गति न्यारी है ।
कष्ट तपस्या पढ़न लिखन सूं ढूंढत मूढ़ अनारी है ॥
अड़सठ तीरथ भरमत डोलैं देहगई सब हारी है ।
निरजल बर्त्तकिये बहुभाँती आश फलन की धारी है ॥
तप करने को बन जा बैठे कीन्ही त्वचा उघारी है ।
पौन अहारी तनहूंगारौ दर्शौ नाहिं मुरारी है ॥
८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
विद्या पढ़ि पढ़ि पण्डित हो वह अर्थ करै बहु भारी है।
अभिमानी है जन्म गँवायो भयो न प्रेम खिलारी है ॥
सांचिभक्ति बिन हरि नहिं रीझै बहुत गये शिरमारी है।
चरणदास शुकदेव श्याम पर तनमनसूं बलिहारी ॥
सुनु रामभक्ति गति न्यारी है ।
योग यज्ञ संयम अरु पूजा प्रेम सबनपर भारी है ॥
जाति वरण पर जो हरि जाते तौ गणिका क्यों तारी है।
शबरी सरस करी सुरमुनिते हीन कुचील जो नारी है॥
दुश्शासन पति खोवन लागो सबही ओर निहारी है।
होय निराश कृष्ण कहूँ टेरी बाढ़ो चीर अपारी है ॥
टेढ़ी लौंडी कंसराजाकी दीन्हों रूप करारी है।
एकसूँ एक अधिक ब्रजनारी कुबजा कीन्ही प्यारी है॥
पांचौ पाण्डवन यज्ञ सजो है सगरी सोंज सँवारी है।
बालमीकि बिन काज न होतो वाजो शंख सुशारी है ॥
साधौं की सेवा में राचो भूपकि सुरति बिसारी है।
सन भक्तके कारण हरिजी वाकी सूरति धारो है ॥
दासकबीरा जाति जोलाहा ब्राह्मण मिल कि ख्वारी है।
बनिजारा हो बालिदधरिलाये ताकी करी सँभारी है॥
साखि सुनौ रैदास चमार सो जग में उजियारी है।
कनक जनेऊ काढ़िदिखायो विप्रगये सब हारी है ॥
अजामील सदना तिरलोचन नामानाम अधारी है।
धन्नाजाट कालु अरु कूबा बहुतकिये भवपारी है॥
प्रीतिबराबर और न दीखै वेदपुराण विचारी है।
चरणदास शुकदेव कहत हैं तावश आप मुरारी है ॥
शब्दवर्णन । ३३६
राग गौरी ॥
आवो साधौ हिलमिल हरियशगावैं ।
प्रेमभक्तिकी रीतिसमझकरि हितसों रामरिझावैं ॥
गोविंदके कौतुक लीला गुण ताको ध्यानलगावैं ।
सेवा सुमिरण वंदन अर्चन नौधासों चितलावैं ॥
अबकी औसर भलो बनो है बहुरि दाँव कबपावैं ।
भजन प्रताप तरेभवसागर उरआनन्द बढ़ावैं ॥
सतसंगति को साबुन लेकर मलता मैल बहावैं ।
मनको धो निरमलकरि उज्ज्वल मगनरूप है जावैं ॥
ताल पखावज झांझ मँजीरा मुरली शङ्ख बजावैं ।
चरणदास शुकदेव दयासूं आवागमन मिटावैं ॥
राग बिलावल ॥
करिले प्रभुसों नेहरा मन मालीयार ।
कहा गर्व जियमें धरै जीवन दिनचार ॥
ज्ञानवेलि गहु टेककी दया क्यारी सवाँर ।
यत सत दृढ़को बीजहिबोवो तासु मँझार ॥
शील क्षमा के कूपको जल प्रेम अपार ।
नेम डोलभरि खैंचिकै सींचो बाग विचार ॥
छलकीकरकूं काटकै बाँधो धीरज बार ।
सुमति सुबुद्धि किसानको राखो रखवार ॥
धर्म्म गुलेल जु प्रीतिकी हित धनुष सुधार ।
झूंठ कपट पक्षीनकूं तासों मार ब्रिड़ार ॥
भक्तिभाव पौधालगै फूलै रङ्ग फुलवार ।
हरिरसमाता होयकै देखै लालबहार ॥
३४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतसंगति फलपाइये मिटै कुबुद्धि विकार ।
जब सतगुरु पूरा मिलै चाखै अमृतसार ॥
समझावै शुकदेवजी चरणदास सँभार ।
तेरी काया में खिलै साँचो गुलजार ॥
राग मंगल
सोई सुहागिनि नारि पिया मनभावई ।
अपने घर को छोड़ि न परघर जावई ॥
अपने पियको भेद न काहू दीजिये ।
तन मन सुरति लगाय कि सेवा कीजिये ॥
पतिकी आज्ञा चाल पाल पियको कहो ।
लाज लिये कुलवंत यतनहींसूं रहो ॥
धनि धनि द्वै जगमाहिं पुरुष बहु हितधरै ।
सब सेनायक होय जो सर्वरकों करै ॥
पियको चाहो रूप सिंगार बनाइये ।
पतिव्रता कुल दोय में शोभा पाइये ॥
नौधा बस्तर पहिरि दया रँगलाल है ।
भूषण लक्षणधार बिचित्तर बाल है ॥
रङ्गमहल निर्दोष ह्वाँ झिलमिल नूर है ।
निर्गुण सेज बिछाय सभी करि दूर भै ॥
मन्दिर दीपक बाल बिना बाती घीव की ।
सुघर चतुर गुणराशि लाड़िली पीवकी ॥
कहैं गुरू शुकदेव यौं बालम मोहिये ।
चरणदास ले सीख जो प्रेम समोइये ॥
शब्दवर्णन । ३४१
राग मंगल
परमसुखी सोइ साधु जो आपा ना थपै ।
मन के रोग मिटाय नाम निर्गुण जपै ॥
परनिन्दा परनारि द्रव्य नाहीं हरै ।
जिन चालन हरि दूरि बीच अन्तर परै ॥
क्षण नहिं बिसरै राम ताहि निकटै तकै ।
हरिचर्चा बिन और वाद नाहीं बकै ॥
झूठ कपट छल भगल ये सकल निवारिये ।
यत सत शील सँतोष क्षमा हियधारिये ॥
काम क्रोध मद लोभ बिड़ारन कीजिये ।
मोह ममता अभिमान अकस तजदीजिये ॥
सब जीवन निर्वैर त्यागि बैरागले ।
तब निरभै ह्वै सन्त भांति काहू न भै ॥
काग करम सब छोड़ि होय हंसागती ।
तृष्णा आश जलाय सोई साधू मती ॥
जगसूं रहै उदास भोग चित ना धरै ।
जब रीझैं करतार दास अपनो करै ॥
कहै गुरू शुकदेव जो ऐसा हूजिये ।
चरणहिंदास विचार प्रेममें भीजिये ॥
राग बिलावल ॥
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण गावरै ।
या देही को कहा भरोसो पल पल छिन छिन छीजत आवरै ॥
कहा अभिमान करै मायाको यह धोखासा जान बावरै ।
मानुषजन्म भागि सों पायो बहुरि न ऐसो कबहूँ दावरै ॥
भवसागर जो उतरो चाहै सतसंगति की चढ़ले नावरै ।
ज्ञानबली गहिपार मुक्ति हों निश्चय तत्त्व पदारथ पावरै ॥
३४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतयुग में सतही सत कहते त्रेता तप करते तनतावरै ।
द्वापर पूजा राजमानसी कलियुगकीर्त्तन हरिहि रिझावरै ॥
तातेसब तजिहरिही हरिभजिनिशिदिन चरणकमल चितलावरै ।
चरणदास शुकदेव चितावें श्याम मिलनको यही उपावरै ॥
जगमें दो तारणको नीका ।
एक तौ ध्यान गुरूका कीजै दूजे नाम धनीका ॥
कोटि भांतिकरि निश्चय कीयो संशयरहा न कोई ।
शास्त्र वेद पुराण टटोले जिनमें निकसा सोई ॥
इनहीं के पीछे सब जानौ योग यज्ञ तप दाना ।
नौविधि नौधा नेम प्रेम सब भक्ति भाव अरु ज्ञाना ॥
और सबै मत ऐसे मानो अन्न बिना भुस जैसे ।
कूटत कूटत बहुतै कटा भूखगई नहिं तैसे ॥
थोथा धर्म वही पहिंचोनौ जामें ये दो नाहीं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं समुझि देखि मनमाहीं ॥
राग आसावरी ॥
साधौ भक्ति नफा करिलीजै । दिन दिन काया छीजै ॥
मकरतजै तो मथुरा मनमें कपट तजै तो कासी ।
और तीर्थ सबही जगन्हाया नाहिं छुटी यम फांसी ॥
भाल तले तिरवेणी राजैं बिरलो जन कोइ न्हावै ।
सुगुरा होयसो नित उठि परशै निगुरा जान न पावै ॥
काया मन्दिर में हरि कहिये वेद पुराण बतावैं ।
इत उत भूले लोग फिरत हैं धोखेको शिरनावैं ॥
यंतरटोना मूड़ हलावन ताकूं सांच न मानौ ।
तजिकै सार असार गह्यो है तापर भयो सयानौ ॥