भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम बिन चैन नहीं दिन राती सुनि पिय जानी हो ॥
दरश दिखावो साँवरे जब हिये सिरानी हो ।
नातर वह गति है है हमरी मीन ज्यों पानी हो ॥
सुख देवो दुख सब हरो काहे बिसरानी हो ।
चरणदासि यह सखी तिहारी मिलजा छानी हो ॥
राग विहागरा ॥
सुधि बुधि सब गई खोयरी मैं इश्क दिवानी ।
तरफतहूँ दिन रैन सखीरी जैसे जल बिन मीननी ॥
बिन देखे मोहिं कल न परत है देखत आंख सिरानी ।
सुधि आये हिय में दव लागै नैनन वर्षत पानी ॥
जैसे चकोर रटत चन्दा को जैसे पपीहा स्वाती ।
ऐसे हम तरफत पिय दर्शन विरह व्यथा इहिभांती ॥
जबते मीत बिछोहा हूवा तबते कछु न सुहानी ।
अंग अंग अकुलात सखीरी रोम रोम मुरझानी ॥
बिन मनमोहन भवन अंधेरो भरि भरि आवै छाती ।
चरणदास शुकदेव मिलावो नैन भये मोहिं घाती ॥
भईहूं प्रेममें चूरहो मोहिं दरशन दीजै ।
हूं तो दासि तिहारी मोहन बेगि खबरिआ लीजै ॥
ज्ञान ध्यान और सुमिरन तेरो तो चरणन चित राखूं ।
तेरोहि नाम जपूं दिन राती तो बिन और न भाखूं ॥
तन व्याकुल जिय रूंधोहि आवत परी प्रीति गलफांसी ।
तुमतो निठुर कठोर महा पिय तुमको आवै हांसी ॥
विरह अग्नि नख शिख सूं लागी मन में कल्पना भारी ।
गिरोहि परत तन सँभरत नाहीं रहत भवन में डारी ॥
कै विष खाय तजों यह काया कै तुम्हरे सँग रहसूं ।