भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३५६
नवल लाड़िलो मोहन सोहन सोई वर वरलीन्होरी ॥
प्रभुको छांड़ भजूं औरनको तौ कहियो बुधिहीनौरी ।
चरणदासको है सुखदायी श्यामसुंदर रँगभीनोरी ॥
वा मुरलियाने हेली मेरे प्राणहरे ।
जब वाजत पियके मुख लागी सुनि धुनि तनकी सुधि बिसरे ॥
ऐसो जप तप कहा कियो है मोहन सोहनलाल बरे ।
जाके रसबस भये श्यामजी ताबिन पलछिन कल न परे ॥
तीनलोक बिच धूम मचाई सुर मुनि ऋषि के ध्यानटरे ।
चरणदास शुकदेव दयासों मनवांछित सब काजसरे ॥
वा मुरलियाके बोल मेरे हिये कसकै ॥
बाजत मान गुमान गरवले करि राखो हरिकों बसकै ॥
बाँकी तान वान ज्यों लागत चुभत कलेजे में धसकै ।
नेक न होत पिया सों न्यारी अधरन के रसके चसकै ॥
कहाकरूं कुछ यतन न दीखै कोई उपाय न होयसकै ।
चरणदास शुकदेव पियारे कवहूँतो वोलेंगे हँसकै ॥
वंशीवारे तू साडी गली आ जावो ।
तैंडे कारण भई बावरी टुक मुख छवि दिखला जावो ॥
व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज तनकी तपत सिरा जावो ।
चरणदास तलफत दर्शन विन शुकदेव दुःख मिटा जावो ॥
राग परज ॥
तुम्हारे रूप लोभानी हो ।
जाति बरन कुल खोयके भइ प्रेम दिवानी हो ॥
खान पान सब सुधि गई और अकबक बानी हो ।
तुम्हरे चरण कमल मन मेरो रहो लिपटानी हो ॥
सुन्दर सूरति सोहनी मेरे नैन समानी हो ।
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