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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 690 में से

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पृष्ठ 387

३४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
यों कहें री अरी हेली कहें साधु अरु सन्त । चरणदास शुकदेव
भी कहें कमलाको कन्त ॥
छूटे आल जंजाल हेली चरण कमल के आसरे ॥
भर्मभूत सबही छुटेरी अरी हेली सौन नक्षत्रनाल ॥ जन्तर
मन्तर सबछुटेरी अरी हेली छूटे वीर मशान । मूठ डीठ अब
ना लगै नहीं घात को बान ॥ शनैश्चरबल अब ना चलैरी
अरी हेली नहीं राहु अरु केतु । मंगल बृहस्पति ना दहैं नहीं
भोग उनदेतु ॥ ज्योति बालपर सो नहींरी अरी हेली मानूं न
देवी देव । सतगुरु मोहि बताया सांचो झूठो भेव ॥ अठसठ
तीरथ ना फिरूंरी अरी हेली पूजूं न पाथर नीर । श्रीशुकदेव छुटा-
इया जन्म मरणकी पीर ॥ निश्चलहो हरि की भईरी अरी हेली
सुमिरूं निर्मलनावँ । अनन्य भक्ति दृढ़सूं गही मारग आन न
जावँ ॥ गोविन्द तजि औरन भजैरी अरी हेली ताके मुहड़े
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