भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३२३
जिनके हाथ परो जिय मेरो घेरा घेरी बहु दुख पायो ॥
एकघरी मोहिं छोड़त नाहीं लहरि चढ़ायकै बहुत नवायो ।
कपि ज्यों घर घर द्वार नचावै उत्तम हरिको नाम छुटायो ॥
अबके शरणि गही है तुम्हरी चरणहिंदास अयाने ।
किरपा करि यह व्याधि छुटावो गुरु शुकदेव सयाने ॥
राग धनाश्री ॥
अब मैं सतगुरु शरणै आयो ।
बिन रसना बिन अक्षर बाणी ऐसोहि जाप सुनायो ॥
काम क्रोध मद पाप जराये त्रिबिधि ताप नशायो ।
नागिनि पांच मुई सँग ममता दृष्टिसूं काल डरायो ॥
किरिया कर्म अचार भुलाना ना तीरथ मग धायो ।
समझौ सहज बचन सुनि गुरु के भर्म को बोझ बगायो ॥
ज्यों ज्यों जपूँ गरकहौं वामें वह मों माहिं समायो ।
जग झूंठो झूंठो तन मेरो यों आपा नहिं पायो ॥
वाकूं जपै जन्म सोइ जीतै सोहम् शुद्ध बतायो ।
चरणदास शुकदेव दया यों सागर लहर समायो ॥
राग सोरठ ॥
गुरुदेव हमारे आवो जी ।
बहुत दिनों से लगी उमाहो आनंद मंगल लावोजी ॥
पलकन पंथ बहारूं तेरो नैनन परि पग धारोजी ।
बाट तिहारी निशिदिन देखूं हमरी ओर निहारोजी ॥
करौं उछाह बहुत मन सेती आंगन चौक पुरावोंजी ।
करूं आरती तन मन वारूं बारबार बलिजावोंजी ॥
दे परिक्रमा शीश नवाऊं सुनि सुनि बचन अघाऊंजी ।
गुरु शुकदेव चरणहूंदासा दर्शन माहिं समाऊंजी ॥