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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 690 में से

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पृष्ठ 372

शब्दवर्णन ३३३
तुम सों कहा छिपाइये हरि घट घट की जानौ ॥
रहमकरो रहमान तू यह दास तिहारो ।
भक्तिपदारथ दीजिये आवागवन निवारो ॥
गुरुशुकदेव उबारलौ अब मेहर करीजै ।
चरणहिंदास गरीब को अपना करलीजै ॥
राग रामकली ॥
चारिबरण सों हरिजन ऊंचे ।
भये पवित्र हरि के सुमिरे तनके उज्ज्वल मनके सूचे ॥
जोन पतीजै साखि बताऊं शबरी के झूठे फल खाये ।
बहुत ऋषीश्वर ह्वांइरहते तिनके घर रघुपति नहिआये ॥
भीलनी पाँव दियो सरिता में शुद्धभयो जल सब कोई जाने ।
मन्दहतो सो निर्मल हूवो अभिमानी नरभये खिसाने ॥
ब्राह्मण क्षत्री भूपहुते बहु बाजो शङ्ख श्वपच जब आयो ।
बालमीकि यज्ञ पूरण कीन्हो जयजयकार भयो यश गायो ॥
जाति बरण कुल सोई नीकौ जाके होय भक्ति परकास ।
गुरु शुकदेव कहत हैं तोको हरिजन सेव चरणहीदास ॥
सब जातिनमें हरिजन प्यारे ।
रहनी तिनकी कोई न पावै तनसों जग में मनसों न्यारे ॥
साखि सुनौ अँबरीष भूप की दुर्बासा जहँ आयो ।
लगो शराप देन राजाको चक्रसुदर्शन जारन धायो ॥
प्रभुजी आये दुर्योधन के वह मनमें गरबायो ।
नाना बधिके ब्यंजन त्यागे साग बिदुर घर रुचिसों पायो ॥
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग मान सन्त को राखो ।
भक्तों वश भगवान सदाहीं वेद, पुराणन में यों भाखो ॥