भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३२७
अति अथाह कछु थाह न पाऊं सोच अचक रहिजावँ ।
गुरु शुकदेव थके रणजीता मैं कछु कौन कहावँ ॥
राग पर्ज ॥
रामगुण कोई न जानेहो ।
शेष महेश गणेश अरु ब्रह्मा रहे थकानेहो ॥
सुरति निरति बुधिगम नहीं सबदेव भुलानेहो ।
सनकादिक नारदहू हारे कौन बखानेहो ॥
योगी जंगम ऋषि मुनि तपसी सुर ज्ञानेहो ।
ध्यान लगावें अन्त न पावें गये हिराने हो ॥
पशु मनुष कहा कहिसकै विषय रस लपटानेहो ।
चरणदास शुकदेव दया यह बात पिछाने हो ॥
राग काफी ॥
रामा रामा जी साइ ॥
अलख निरंजन रूपा । तूही एक अनेक स्वरूपा ॥
तेरी ज्योति सकल जगछाई । तू घटघट रहो समाई ॥
तूही आदि अनादि कहावै । ब्रह्मादिक पार न पावै ॥
अबिगत अविनाशी जाना । निरगुण सरगुण पहिंचाना ॥
बहु बिधि के भेष बनावै । सिरजै पालै बिनशावै ॥
अचरज कौतुक बिस्तारा । जनकारण ले अवतारा ॥
तूही है देवनको देवा । सनकादिक लहैं न भेवा ॥
चाहै सो करै पलमाहीं । तूही व्यापक है सब ठाहीं ॥
तूही ज्ञानी गुणी अपारा । पूरण परमातम प्यारा ॥
गुण बहुत कहांलौं गाऊं । बिनती करि शीश नवाऊं ॥
शुकदेव गुरू बतलाया । चरणदास शरण तेरी आया ॥
रामारामाजी टे० सुनिलिजै बिनती मेरी । मैं शरण गही है तेरी ॥
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