सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380

शब्दवर्णन । ३४१
राग मंगल
परमसुखी सोइ साधु जो आपा ना थपै ।
मन के रोग मिटाय नाम निर्गुण जपै ॥
परनिन्दा परनारि द्रव्य नाहीं हरै ।
जिन चालन हरि दूरि बीच अन्तर परै ॥
क्षण नहिं बिसरै राम ताहि निकटै तकै ।
हरिचर्चा बिन और वाद नाहीं बकै ॥
झूठ कपट छल भगल ये सकल निवारिये ।
यत सत शील सँतोष क्षमा हियधारिये ॥
काम क्रोध मद लोभ बिड़ारन कीजिये ।
मोह ममता अभिमान अकस तजदीजिये ॥
सब जीवन निर्वैर त्यागि बैरागले ।
तब निरभै ह्वै सन्त भांति काहू न भै ॥
काग करम सब छोड़ि होय हंसागती ।
तृष्णा आश जलाय सोई साधू मती ॥
जगसूं रहै उदास भोग चित ना धरै ।
जब रीझैं करतार दास अपनो करै ॥
कहै गुरू शुकदेव जो ऐसा हूजिये ।
चरणहिंदास विचार प्रेममें भीजिये ॥
राग बिलावल ॥
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण गावरै ।
या देही को कहा भरोसो पल पल छिन छिन छीजत आवरै ॥
कहा अभिमान करै मायाको यह धोखासा जान बावरै ।
मानुषजन्म भागि सों पायो बहुरि न ऐसो कबहूँ दावरै ॥
भवसागर जो उतरो चाहै सतसंगति की चढ़ले नावरै ।
ज्ञानबली गहिपार मुक्ति हों निश्चय तत्त्व पदारथ पावरै ॥