भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन ३३१
चरणदास के घट में बैरी तिनको क्यों न बिदारों ॥
राग बिभास ॥
राखो जी लाज गरीबनवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारे सबही बिगरैं काज ॥
भक्तबछल हरिनाम कहावो पतिउधारणहार ।
करो मनोरथ पूरण जन के शीतल दृष्टि निहार ॥
तुम जहाज मैं काग तिहारो तुम तजि अन्त न जाऊँ ।
जो तुम हरिजी मारि निकासो और ठौर नहिं पाऊं ॥
चरणदास प्रभु शरण तिहारी जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तिहारी तुम्हूँ देखि बिचार ॥
राग बिलावल ॥
प्रभुजी शरण तिहारी मैं आयो ।
जो कोइ शरण तिहारी नाहीं भर्मि-भर्मि दुख पायो ॥
औरन के मन देवी देवा मेरे मन तुहि भायो ।
जबसों सुरति सँभारी जग में और न शीश नवायो ॥
नरपति¹ सुरपति² आश तिहारी यह सुनकरि मैं धायो ।
तीरथ बरत सकल फल त्यागे चरणकमल चितलायो ॥
नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरोही ध्यान लगायो ।
आदि अनादि जुगादि तेरो यश वेद पुराणन गायो ॥
अब क्यों न बांह गहो हरि मेरी तुम काहे बिसरायो ।
चरणदास कहैं करता तूंहीं गुरु शुकदेव बतायो ॥
राग केदारा ॥
अबकी तारिहौ बलबीर ।
चूक मोसों परी भारी कुबुधि के संगसीर ॥
१ मनुष्य का राजा २ इन्द्र ॥