भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतसंगति फलपाइये मिटै कुबुद्धि विकार ।
जब सतगुरु पूरा मिलै चाखै अमृतसार ॥
समझावै शुकदेवजी चरणदास सँभार ।
तेरी काया में खिलै साँचो गुलजार ॥
राग मंगल
सोई सुहागिनि नारि पिया मनभावई ।
अपने घर को छोड़ि न परघर जावई ॥
अपने पियको भेद न काहू दीजिये ।
तन मन सुरति लगाय कि सेवा कीजिये ॥
पतिकी आज्ञा चाल पाल पियको कहो ।
लाज लिये कुलवंत यतनहींसूं रहो ॥
धनि धनि द्वै जगमाहिं पुरुष बहु हितधरै ।
सब सेनायक होय जो सर्वरकों करै ॥
पियको चाहो रूप सिंगार बनाइये ।
पतिव्रता कुल दोय में शोभा पाइये ॥
नौधा बस्तर पहिरि दया रँगलाल है ।
भूषण लक्षणधार बिचित्तर बाल है ॥
रङ्गमहल निर्दोष ह्वाँ झिलमिल नूर है ।
निर्गुण सेज बिछाय सभी करि दूर भै ॥
मन्दिर दीपक बाल बिना बाती घीव की ।
सुघर चतुर गुणराशि लाड़िली पीवकी ॥
कहैं गुरू शुकदेव यौं बालम मोहिये ।
चरणदास ले सीख जो प्रेम समोइये ॥