भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतयुग में सतही सत कहते त्रेता तप करते तनतावरै ।
द्वापर पूजा राजमानसी कलियुगकीर्त्तन हरिहि रिझावरै ॥
तातेसब तजिहरिही हरिभजिनिशिदिन चरणकमल चितलावरै ।
चरणदास शुकदेव चितावें श्याम मिलनको यही उपावरै ॥
जगमें दो तारणको नीका ।
एक तौ ध्यान गुरूका कीजै दूजे नाम धनीका ॥
कोटि भांतिकरि निश्चय कीयो संशयरहा न कोई ।
शास्त्र वेद पुराण टटोले जिनमें निकसा सोई ॥
इनहीं के पीछे सब जानौ योग यज्ञ तप दाना ।
नौविधि नौधा नेम प्रेम सब भक्ति भाव अरु ज्ञाना ॥
और सबै मत ऐसे मानो अन्न बिना भुस जैसे ।
कूटत कूटत बहुतै कटा भूखगई नहिं तैसे ॥
थोथा धर्म वही पहिंचोनौ जामें ये दो नाहीं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं समुझि देखि मनमाहीं ॥
राग आसावरी ॥
साधौ भक्ति नफा करिलीजै । दिन दिन काया छीजै ॥
मकरतजै तो मथुरा मनमें कपट तजै तो कासी ।
और तीर्थ सबही जगन्हाया नाहिं छुटी यम फांसी ॥
भाल तले तिरवेणी राजैं बिरलो जन कोइ न्हावै ।
सुगुरा होयसो नित उठि परशै निगुरा जान न पावै ॥
काया मन्दिर में हरि कहिये वेद पुराण बतावैं ।
इत उत भूले लोग फिरत हैं धोखेको शिरनावैं ॥
यंतरटोना मूड़ हलावन ताकूं सांच न मानौ ।
तजिकै सार असार गह्यो है तापर भयो सयानौ ॥