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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 690 में से

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पृष्ठ 368

शब्दवर्णन । ३२६
बालपने अरु तरुण अवस्था और बुढ़ापे माहीं ।
हम से भई सभी तुम जानौ तुम से नेकहु छानी नाहीं ॥
अनगिन पाप किये मनमाने नखशिख अवगुण धारी ।
फिरि फिरिकै सुनिशरणै आयो अब तुमको है लाज हमारी ॥
शुभकरमन को मारग छूटो आलस निद्रा घेरो ।
एकहि बात भली बनिआई जग में कहायौं तेरो चेरो ॥
दीनदयालु गुपाल बिश्वंभर श्रीशुकदेव गुसाईं ।
जैसे और पतित घनतारे चरणदास की गहिये बाहीं ॥
अर्ज सुनौ जगदीश गुसाईं ।
ग्रह नक्षत्र देव बिसारे चरण कमल की आयो छाई ॥
सत बिश्वास यही हिय धारो तोहि न भूलों एक घरी ।
इतउत से मन खैंचि लियो है काहू से कछु नाहिं सरी ॥
अब चाहो सो करो प्रभु तुम्हीं द्वार तुम्हारे सुरति अरी ।
भावै नरक, स्वर्ग पहुँचावो भावै राखौ निकट हरी ॥
अपनी चाहरही नहिं कोई जबसूं तुम्हरी आश धरी ।
आन भरोसो छोड़ि दियो है सकल बिकल सब प्यारकरी ॥
यह आपा तुम्हीं को दीनो मेरी मो मैं कुछ न रही ।
आदि पुरुष शुकदेव सुनोजी चरणदास यह टेरि कही ॥
राग बिभास ॥
अबकी करो सहाय हमारी ।
दुष्टदलन अरु भक्तबचावन ऐसी साखि तुम्हारी ॥
जन प्रह्लाद असुर गहि बांध्यों लीन्हो खङ्ग निकारी ।
हिरणाकुश हनि दास उबारो नरसिंह को तनु धारी ॥
खैंचि ग्राह गज बोरन लागो राम कह्यो इकबारी ।