भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें' शब्दवर्णन । ३२५
राज कूं ग्राह खैंच्यो तबै टेरदे हेर कीन्ही पुकारी । गरुड़ तजि
धाय आये छुटायो तुरत हरि हिये ब्याधि तनु बिपति डारी ॥
ध्रुव अचल कियो प्रहादकूं दर्श दियो दास हनुमानसूं प्रीति
भारी । भीलनी अरु कामी अजामील से अधम अति पतित
गणिका उबारी ॥ पाण्डुसुतहूँ बचाये जरत अग्निसूं द्रौपदी
चीर बाढ़ो अपारी । नामदेव सैन पीपा कबीरा सदन नरसिया
दासिमीरा उधारी ॥ कोटि अनगिन भक्त तारि दिये तनक
मैं कहो मेरी सुरति क्यों बिसारी । तो बिना कहां जाऊँ कहीं
ठौर ना तेरेही द्वार कोहूँ भिखारी ॥ सकल संशय हरण तूही
तारणतरण श्याम शुकदेव गिरिधर मुरारी । दास चरणदास
को आसरो तुही है आपनो जानलीजै सँभारी ॥१॥ साधौ सोई
जनशूर जो खेत में मड़रहै भक्ति मैदान में रहै ठाढ़ो । सकल
लज्जा तजै महा निरभै गजै पैज नीशान जि आय गाड़ा ॥
भये बहुबीर गम्भीर जे धीर मत सबन को यश कहत ग्रन्थ
होई । तिनविषे कछू इकनाम वर्णन करूं सुनौ हो सन्तदै
चित्त सोई ॥ पितासूं रूठि ध्रुव पांचही वर्षकौ टेक गहि भक्ति
के पन्थ धायो । छल भयो ना डिगो टेक पूरी भई जीति
मैदान हरि दर्श पायो ॥ हठो प्रहाद हरिनाम छाँड़ो नहीं
बापने त्रासदै बहु डिगायो । टेक जब ना टरी राम रक्षाकरी
दुष्ट को मारिक जन जितायो ॥ कबीर दादू धने पहिरि
बख्तर बने नामदेव सारिखे बहुत कूदे । सेन सदना बली भक्त
पीपा बड़ो रामकी ओरकूं चले सूधे ॥ मलूक जैदेव गज ग्राह
कलँगी धरे शूर रैदास मुख नाहिं मोड़ा । ध्यान बन्दूक में
प्रेम रञ्जकजमा मीरमाधो चला कुदाय घोड़ा ॥ दासमीरा
पिली प्रेम सम्मुख चली छोड़ि दई लाजकुल नाहिं माना ।