भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३३६
राग गौरी ॥
आवो साधौ हिलमिल हरियशगावैं ।
प्रेमभक्तिकी रीतिसमझकरि हितसों रामरिझावैं ॥
गोविंदके कौतुक लीला गुण ताको ध्यानलगावैं ।
सेवा सुमिरण वंदन अर्चन नौधासों चितलावैं ॥
अबकी औसर भलो बनो है बहुरि दाँव कबपावैं ।
भजन प्रताप तरेभवसागर उरआनन्द बढ़ावैं ॥
सतसंगति को साबुन लेकर मलता मैल बहावैं ।
मनको धो निरमलकरि उज्ज्वल मगनरूप है जावैं ॥
ताल पखावज झांझ मँजीरा मुरली शङ्ख बजावैं ।
चरणदास शुकदेव दयासूं आवागमन मिटावैं ॥
राग बिलावल ॥
करिले प्रभुसों नेहरा मन मालीयार ।
कहा गर्व जियमें धरै जीवन दिनचार ॥
ज्ञानवेलि गहु टेककी दया क्यारी सवाँर ।
यत सत दृढ़को बीजहिबोवो तासु मँझार ॥
शील क्षमा के कूपको जल प्रेम अपार ।
नेम डोलभरि खैंचिकै सींचो बाग विचार ॥
छलकीकरकूं काटकै बाँधो धीरज बार ।
सुमति सुबुद्धि किसानको राखो रखवार ॥
धर्म्म गुलेल जु प्रीतिकी हित धनुष सुधार ।
झूंठ कपट पक्षीनकूं तासों मार ब्रिड़ार ॥
भक्तिभाव पौधालगै फूलै रङ्ग फुलवार ।
हरिरसमाता होयकै देखै लालबहार ॥