भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र घर कहीं होय क्यों न बासा ।
धनिकुल वह शुकदेव बखाने यह तुम सुनौ चरणहीदासा ॥
राग कान्हरा ॥
धनि वे नर हरिदास कहाये ।
रामभक्ति दृढ़हीकरि पकरी आन धर्म सबही बिसराये ॥
आठपहर गलतान भजन में प्रेममगन हिय में हुलसाये ।
आप तरै तारै औरनको बहुतक पापी पार लगाये ॥
प्रभु दर्शन बिन और न आशा धर्म्मकाम अरु मोक्ष न चाहै ।
आठो सिद्धि फिरें सँग लागी नेक न देखें नैन उठाये ॥
तिनको ऋषिमुनि जापकरत हैं हरिजन हरिदोउ सँगहीगाये ।
ऊंची पदवी इन्द्रहुते देवन देखि अधिक ललचाये ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा धनि माता ऐसे जन जाये ।
जीवत शोभाजग में पाई तन छूटे हरि माहिं समाये ॥
राग सोरठा ॥
मोको कछु न चहिये राम ।
तुम बिन सबही फीके लागैं नाना सुख धन धाम
आठ सिद्धि नौनिद्धि आपनी और जननको दीजै ।
मैं तौ चेरो जन्म जन्मको निजकरि अपनो कीजै ॥
स्वर्ग फलनकी मोह न आशा ना वैकुंठ न मोक्षहि चाहूँ ।
चरणकमल के राखौ पासा
यहउरमाहिंउमाहूँभक्तिनछांडौंमुक्तिन मांगौंसुनुशुकदेवमुरारी
चरणदास की यही टेक है तजौं न गैल तुम्हारी ॥
राग भैरव ॥
वह पुरुषोत्तम मेरा यार । नेह लगा टूटै नहिं तार ॥
तीरथ जाऊं न बर्त्त करूं । चरणकमल को ध्यान धरूं ॥