भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 371, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भवसागर की धार तीक्ष्ण महागँधीलो नीर ।
काम क्रोध मदलोभ भँवर में चित न धरत तहां धीर ॥
मच्छ जहां बलवन्त पांचौ थाह गहर गँभीर ।
मोह पवन झकोर दारुण दूर पैलौतीर ॥
नाव तौ मँझधार भरमी हिये बाढ़ी पीर ।
चरणदास कहै कोई नाहिं संगी तुम बिना हरिहीर ॥
राग सोरठ ॥
अब जगफंद छुटावोजी हूँ तौ चरणकमल को चेरो ।
परो रहूं दरबार तिहारे संतन माहिं बसेरो ॥
बिना कामना करूं चाकरी आठौं पहरेनेरो ।
मनसब भक्ति क्रिपा करि दीजै मोहिं यही बहुतेरो ॥
खानेजाद कदीमी कहियो तुही आसरो मेरो ।
झिड़क बिड़ारौ तऊ न छांडौ सेवा सुमिरण तेरो ॥
काहू और आन देवन सों रहो नहीं उरझेरो ।
जैसे राखो त्योंही रहहूं कर लीजौ सुरझेरो ॥
तेरे घर बिन कहूं न मेरो ठौर ठिकानो डेरो ।
मोसे पतित दीन को हरिजी तुम्हीं करो निबेरो ॥
गुरु शुकदेव दयाकरि मोकूं ओर तिहारी फेरो ।
चरणदास को शरणै राखो यही इनाम घनेरो ॥
राग बिलावल ॥
तुम साहब करतार हो हम बन्दे तेरे ।
रोम रोम गुनहगार हैं बकसो हरि मेरे ॥
दशों दुवारे मैल है सब गन्दम गन्धा ।
उत्तम तेरो नाम है बिसरे सो अन्धा ॥
गुणतजिकै अवगुणकिये तुमसबपहिंचानौ ।