भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 363, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
हो अँखियाँ गुरु दर्शन की प्यासी ।
इकटक लागी पंथ निहारूं तनसूं भई उदासी ॥
राति दिना मोहिं चैन नहीं है चिन्ता अधिक सतावै ।
तलफतरहूँ कल्पना भारी निश्चल बुधि नहिं आवै ॥
तन गयो सूख हूक अति लागी हिरदय पावक बाढ़ी ।
खिनमें लेटी खिनमें बैठी घर अँगना खिन ठाढ़ी ॥
भीतर बाहर संग सहेली बात नहीं समझावैं ।
चरणदास शुकदेव पियारे नैनन ना दर्शावैं ॥
राग भैरव ॥
गुरु बिन मेरे और न कोय । जग के नाते सब दिये खोय ॥
गुरुही मातु पिता अरु वीर । गुरुही सम्पति जीव शरीर ॥
गुरुही जाति वरण कुल गोत । जहां तहां गुरु संगी होत ॥
गुरुही तीरथ बरत हमार । दीन्हे और धरम सबडार ॥
गुरुही नाम जपौं दिन रैन । गुरुको ध्यान परम सुख दैन ॥
गुरु के चरण कमलकर वास । और न राखूं कोई आस ॥
जो कुछ चाहें गुरुही करें । भावै छाँहँ धूप लै धरैं ॥
आदिपुरुष गुरुही कूं जानूं । गुरुही मुक्तीरूप पिछानूं ॥
चरणदास के गुरु शुकदेव । और न दूजा लागै लेव ॥
अथ भक्तिअंग वर्णन राग करखा ॥
राखिये लाज महाराज गोपालजी दीनजन शरण आयो
तिहारी । लगो मोहि ध्यान दृढ़ चरण ही कमल में कीजिये
किरपा सुनिहो बिहारी ॥ विषय जंजार रस स्वाद घेरो
घनो पांचहूं चोर दुख देहिं भारी । नीच बहु दुष्ट बलवान
ठग तकैं निसि द्यौस हिये घात डारी ॥ पकरि गज-