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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 690 में से

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पृष्ठ 377

८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
विद्या पढ़ि पढ़ि पण्डित हो वह अर्थ करै बहु भारी है।
अभिमानी है जन्म गँवायो भयो न प्रेम खिलारी है ॥
सांचिभक्ति बिन हरि नहिं रीझै बहुत गये शिरमारी है।
चरणदास शुकदेव श्याम पर तनमनसूं बलिहारी ॥
सुनु रामभक्ति गति न्यारी है ।
योग यज्ञ संयम अरु पूजा प्रेम सबनपर भारी है ॥
जाति वरण पर जो हरि जाते तौ गणिका क्यों तारी है।
शबरी सरस करी सुरमुनिते हीन कुचील जो नारी है॥
दुश्शासन पति खोवन लागो सबही ओर निहारी है।
होय निराश कृष्ण कहूँ टेरी बाढ़ो चीर अपारी है ॥
टेढ़ी लौंडी कंसराजाकी दीन्हों रूप करारी है।
एकसूँ एक अधिक ब्रजनारी कुबजा कीन्ही प्यारी है॥
पांचौ पाण्डवन यज्ञ सजो है सगरी सोंज सँवारी है।
बालमीकि बिन काज न होतो वाजो शंख सुशारी है ॥
साधौं की सेवा में राचो भूपकि सुरति बिसारी है।
सन भक्तके कारण हरिजी वाकी सूरति धारो है ॥
दासकबीरा जाति जोलाहा ब्राह्मण मिल कि ख्वारी है।
बनिजारा हो बालिदधरिलाये ताकी करी सँभारी है॥
साखि सुनौ रैदास चमार सो जग में उजियारी है।
कनक जनेऊ काढ़िदिखायो विप्रगये सब हारी है ॥
अजामील सदना तिरलोचन नामानाम अधारी है।
धन्नाजाट कालु अरु कूबा बहुतकिये भवपारी है॥
प्रीतिबराबर और न दीखै वेदपुराण विचारी है।
चरणदास शुकदेव कहत हैं तावश आप मुरारी है ॥