भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और शबरी मंडी तोड़ि ऊँचीगढी दौर करमाचली प्रेम जाना ॥
श्रीशुकदेव रणजीत सांवत कियो लड़े कलियुग बिषे खम्भ
गाड़े । बहुत सेना लिये ललक हूहू किये चरणहींदास सँग
नाहिं छांड़े ॥
राग काफी ॥
हे जगके करतार तेरी कहा अस्तुति कीजै ।
तूही एक अनेक भयो है अपनी इच्छाधार ॥
तूही सिरजै तूही पालै तूही करै संहार ।
जितदेखूं तित तूही तूहै तेरा रूप अपार ॥
तूही रामनरायण तूही तूही कृष्ण मुरार ।
साधौं की रक्षाके कारण युग युग ले अवतार ॥
तुही आदि अरु मध्य तुही है अन्ततेरा उजियार ।
दानव देव तोहीसूं प्रगटे तीनलोक बिस्तार ॥
जल थल में व्यापक है तूही घटघट बोलनहार ।
तोबिन और कौन है ऐसो जासों करों पुकार ॥
तूही चतुर शिरोमणि है प्रभु तूही पतित उधार ।
चरणदास शुकदेव तुही है जीवन प्राणअधार ॥१॥
तव गुण करूं बखान यह मेरी बुद्धि कहां है ।
चतुर्मुखी ब्रह्मा गुण गावैं तिनहुँ न पायो जान ॥
गण गावत शंकर जब हारे करनेलागे ध्यान ।
गुण अपार कछु पार न पायो सनकादिक कथज्ञान ॥
गण गावत नारदमुनि थाके सहसमुखनसूं शेष ।
लीला को कछु वार न पारा ना परिमाण न भेश ॥
शक्ति घनी अनगिनत तुम्हारी बहुरूप बहुनावँ ।
जबहिं बिचारूं हियेमें हरूं अचरज हेरि हिरावँ ॥