भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुनत पुकार पयादेहि धाये तजिकै गरुड़ सवारी ॥
द्रौपदि लाज उतारण कारण लाये सभा मँझारी ।
दीनानाथ लई सुधि वेगहि बाढो चीर अपारी ॥
जिन जिन शरण गही संकट में कहा पुरुप कहा नारी ।
चारो युग हरि करी सहाई रक्षक भये मुरारी ॥
गुरु शुकदेव बतायो तोंकों सन्तन कौ रखवारी ।
चरणदास थकि द्वारे तेरे गुण पौरुष दिये डारी ॥
राग धनाश्री ॥
अब तुम करो सहाय हमारी ।
मन के रोग होय गये दीरघ तन के बड़े विकारी ॥
तुम सो बैद और को दूसर जाहि दिखाउं नारी ।
सजीवनमूल अमर हो जासों सोहै दया तुम्हारी ॥
क्रिया कर्म की औषधि जेती रोग बढ़ावनहारी ।
दीजै चूर्ण ज्ञान भक्ति को मेटो सकल व्यथारी ॥
जन के काज पयादे धावत चरणकमल पर वारी ।
मैं भयो दास अधीन तुम्हारो मेरी करो सँभारी ॥
जो मोहिं कुटिल कुचील जानिकै मेरी सुरति विसारी ।
चरणदास शुकदेव तुम्हारो दुष्ट हँसेंगे भारी ॥
हरिजी संकट वेगि निवारो ।
जनकूं भीर परी है भारी चक्र सुदर्शन धारो ॥
कंसनिकंदन रावणगंजन हिरणाकुश गहि मारो ।
दुष्टदलन अरु भक्तउबारन जन प्रह्लाद उबारो ॥
पांचो पाण्डव राख लिये हैं कौरव दल संहारो ।
जिन जिन द्वेष कियो सन्तन सों सो सोई हनि डारो ॥
निरभय भक्ति करें जन तेरे ऐसो समय बिचारो ।