भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३३५
प्राण पियारे मेरेहि पासा । बन बन माहिं न फिरूं उदासा ॥
पढूं न गीता वेद पुरान । एकहि सुमिरौं श्रीभगवान ॥
औरनको नहिं नाऊं शीश । हरिही हरि हैं बिस्वेबीश ॥
काहूकी नहिं राखूं आस । तृष्णा काटि दही है फाँस ॥
उद्यम करूं न राखूं दाम । सहजहि ह्वै रहै पूरणकाम ॥
सिद्धि मुक्तिफल चाहौं नाहिं । नितहि रहूँ हरि संतन माहिं ॥
गुरु शुकदेव यही मोहिं दीन । चरणदास आनँद लवलीन ॥
यों कहैं हरिजी दयानिधान । सन्त हमारे जीवनप्रान ॥
सन्त चलैं जहाँ सँगही जावँ । सन्त दियो सो भोजन खावँ ॥
सन्त सुलावैं जितरहूँ सोय । सन्त बिना मेरे और न कोय ॥
सन्त हमारे माई बाप । सन्तहि को मनराखूं जाप ॥
सन्तको ध्यान धरौं दिनरैन । सन्त बिना मोहिं परै न चैन ॥
सन्त हमारी देही जान । सन्तहिं की राखूं पहिंचान ॥
सन्तकी सकल बलइया लेवँ । सन्त कूं अपनो सर्वस देवँ ॥
संतहिहेत धरूं अवतार । रक्षाकारण करूं न बार ॥
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