भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परमेश्वर मिलनेकी लहरैं इक आवै इक जावै ।
कहैं शुकदेव चरणहीं दासा हरिहू कंठ लगावै ॥
राग विलावल ॥
हमारे चरणकमल को ध्यान ।
मूरख जगत भर्मता डोले चाहत जल अस्नान ॥
सब तीरथ वाही सों प्रकटे गंगा आदिक जान ।
जिन सेवन सब पातक नाश नितहोवै कल्यान ॥
साकत गिरही बानेधारी हैं सब ही अज्ञान ।
हरिसो हीरा छांड़िदियो है पूजे कांच पखान ॥
हरि चरण की महिमा जानैं हैं वे सन्त सुजान ।
भौंदू नर मायाके चेरे इनको कहा पहिंचान ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दीन्हों अंजन ज्ञान ।
साँचो प्रीतम सूझ परो है बिसरिगयो सब आन ॥
राग नट व विलावल सारंग ॥
हमारे रामभक्ति धनभारी ।
राज न डांडै चोर न चोरै लूटि सकै नहिं धारी ॥
प्रभु पैसे अरु रामरुपइये मुहर मुहब्बत हरिकी ।
हीराज्ञान युक्तके मोती कहा कमी हां ज़रकी ॥
सोना शील भँडार भरे हैं रूपा रूप अपारा ।
ऐसी दौलत सतगुरु दीन्हीं जाका सकल पसारा ॥
बाँटों बहुत घटै नहिं कबहूं दिन दिन ज्यौढ़ी ज्यौढ़ी ।
चोखा माल द्रव्य अति नीका बट्टा लगै न कौड़ी ॥
साह गुरू शुकदेव विराजैं चरणदास बन जोटा ।
मिलि मिलि रंक भूप हो बैठै कबहूँ न आवै टोटा ॥