भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 367, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तैं बहुतै पतित उधारे । भवजलसूं पार उतारे ॥
हौं सब को नाम न जानूं । अब कोइ कोइ भक्त बखानूं ॥
अँबरीष सुदामा नामा । सो पहुँचाये निजधामा ॥
ध्रुव पांच बरष को बाला । तेहि दर्शन दियो गोपाला ॥
प्रह्लाद टेक तुम राखी । यों जानत हैं सब साखी ॥
शबरी के फल तुम खाये । त्रयलोचन के घर आये ॥
पांडवन की करी सहाई । द्रौपदी की लाज बचाई ॥
गणिकाहू पार लगाई । करमा की खिचरी खाई ॥
मीरा तुम्हारे रंग भीनी । नरसी की हुंडी लीनी ॥
धन्नाको खेत जमायो । तैं साग विदुर घर पायो ॥
कबिराके बादल लाये । सब काज किये मनभाये ॥
सदना से सेना नाई । तैं बहुत किये मुकताई ॥
ग्राहसुं गज जाय छुटायो । तैं मोकूं क्यों बिसरायो ॥
सनकादिक ब्रह्मा ध्यावैं । तेरा शेश आदि यश गावैं ॥
तेरा वेद पार नहीं पाया । जिन नेति नेति बतलाया ॥
मैं काम क्रोध ने घेरा । ममता की उर उरझेरा ॥
मोह लोभ के फन्दे फरिया । तेरा नाम बिसरि दुखभरिया॥
अब तुम्हीं करो निबेरा । मोहिं जानि चरणकों चेरा ॥
मैं पापी महा सन्तापी । अपराधी बहुत कलापी ॥
तुमै छाँड़ि कासुपै जाऊं । यह दुख कौने समझाऊं ॥
शुकदेव गुरू मैं पाया । जिन तेराही नाम बताया ॥
चरणदास आपनो कीजै । मोहिं भक्तिदान बर दीजै ॥
राग रामकली ॥
पतित उधारण बिरद तुम्हारो ।
जो यह बात सांच है हरिजी तौ तुम हमको पार उतारो ॥