भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३३७
राग नट वा बिलावल ॥
जो नर हरि धनसों चितलावै ।
जैसे तैसे टोटा नाहीं लाभ सवायापावै ॥
मन करि कोठी नाव खजानो भक्तिदुकानलगावै ।
पूरा सतगुरु सांझी करिकै संगति वणिज चलावै ॥
हुंडी ध्यान सुरतिलै पहुंचै प्रेम नगरके माहीं ।
सीधा साहूकारा सांचा हेर फेर कछु नाहीं ॥
जित सौदागर सबही सुखिया गुरुशुकदेव बसाये ।
चरणहिंदास बिलमि रहे हाई जूनी पन्थ न आये ॥
राग देवगन्धार ॥
मनुवाँ राम के व्यौपारी ।
अबकै खेप भक्तिकी लादी वणिज कियो तैं भारी ॥
पांचौ चोर सदा मग रोकत इनसों कर छुटकारी ।
सतगुरु नायक के सँग मिलि चल लूट सकै नहिं धारी ॥
दो ठग मारग माहिं मिलेंगे एक कनक इक नारी ।
सावधानहो पेच न खइयो रहियो आप सँभारा ॥
हरिके नगर में जा पहुंचौगे पैहौ लाभ अपारी ।
चरणदास तोको समझावै रामन वारंवारी ॥
राग सोरठ ॥
हरि पावनकी गति न्यारी है ।
कष्ट तपस्या पढ़न लिखन सूं ढूंढत मूढ़ अनारी है ॥
अड़सठ तीरथ भरमत डोलैं देहगई सब हारी है ।
निरजल बर्त्तकिये बहुभाँती आश फलन की धारी है ॥
तप करने को बन जा बैठे कीन्ही त्वचा उघारी है ।
पौन अहारी तनहूंगारौ दर्शौ नाहिं मुरारी है ॥