भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
२६८ ˙ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै।
कला घटै अरू बढ़ै मावस लगना रहै॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरहीं॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय॥
अष्टपदी॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है।
कबहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिक्षा दोलई।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै ।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है ॥
मोह न कवहूँ करै जु कोई कछु चहै ।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै ॥
दो० लेते कछु हरषै नहीं, देते दुख नहिं होय ।
ऐसे निलोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है ।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवैंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥
२७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० करि विचार मनमें धरी, धन्यभाग सुख होय ।
हम समान या जगतमें, और न दीखै कोय ॥
अष्टपदी ॥
भयो कपोतिनि गर्भ अण्ड द्वै वा दिये ।
प्रीतिसों सेवन किये फूटि द्वै सुत भये ॥
केतक दिवसन माहिं पंख निकसे सभी ।
उड़िकै बैठन लगे डार ऊपर तभी ॥
निरखत बहुसुख मानि कपोत कपोतिनी ।
हमरे अति बड़भाग दियो यह सुख धनी ॥
एक रहे घर माहिं जु रक्षा धारने ।
दूजे वन में जाय जीविका कारने ॥
बनसे चूगालाय बचन मुखं डारई ।
बाते उनकी क्षुधा सकल निरवारई ॥
जन्म सुफल मन जानि रैनदिन यों रहै ।
वसुधामें कछु शोच न हियमाहीं लहै ।
इकदिन कह्योकपोत कपोतिनि साथही ।
ये बच्चा अब बड़े भये सब गातही ॥
एतौ रहैं गृहमाहिं दोऊ हम वन चलें ।
चूगा लावैं बहुत करैं भोजन भलैं ॥
है करि निस्संदेह दोऊ वन को चले ।
कहैं चरणहींदास चुगन लागे भले ॥
दो० पाछे बधिक जु आइया, दीनो जाल बिछाय ।
पकरन की मनमें करी, बैठ्यो घात लगाय ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७१
अष्टपदी ॥
दोऊ गये वनमाहिं वधिक इक आइया ।
उन बचनको देखिकै जाल बिछाइया ॥
तापर किणका डारि आपतौ छिपिरह्यो ।
बचन चूगा देखि भेद कछु ना लह्यो ॥
यह कण कारण मात पिता वनको रमै ।
सो पायो यहि ठौर चुगैं क्यों ना हमै ॥
दोऊ उतरे तहां जबै मुख डारिया ।
तब वहि वधिकने जाल फंदकों मारिया ॥
आय कपोतिनि जबै शब्द नाहीं सुनो ।
घरमें पाये नाहि शीश तबहीं धुनो ॥
बचन कारण शब्द कियो हंकारिकै ।
बोले पिंजर माहिं जु वचन निहारिकै ॥
देखि कपोतिनि जालमें यह मन आनिया ।
अपना जीवन अफल जगतमें जानिया ॥
तनमें अतिदुख पाय कल्पना बहु करी ।
कहैं चरणहींदास बुरी आशा धरी ॥
दो० जाल माहिं मोसुत फँसे, जाय परौं वा ठौर ।
विकल होय चाली तबै, कियो विचार न और ॥
अष्टपदी ॥
मोह फंद वश होय जाल माहीं परी ।
वाहू को गहि वधिक पिंजर माहीं धरी ॥
आयो बहुरि कपोत लख्यो सुत बालहूँ ।
इन बिन कैसे जिऊं मरौं बेहालहूँ ॥
३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परो जाल के माहिं बहुत दुख मानिकै ।
चारौ गहिलै चलो वधिक सुख जानिकै ॥
राजा मो मनहुतीं जु सुत दाराकरूं ।
निरखिलई यह सीख बहुरि नहिं चितधरूं ॥
वाकौ कीन्ह्यो गुरू चरित यह देखिकै ।
हरि सुमिरण से पगोरहूं जु विशेषिकै ॥
मोह महादुखरूप सकल बिसराइया ।
लिये रहूं वैराग परमसुख पाइया ॥
सदा रहूं निर्बंध दुःख सब भाजिया ।
चरण कमलको ध्यान हियेमें साजिया ॥
तहां बसौं निशिभोर अंत नहीं बहूं ।
चरणहिंदासा होयकै निज आनँद लहूं ॥
दो० नवां गुरू अजगरकियो, लियो परम संतोष ।
परलब्ध दृढ़ करि गही, रहा राग नहिं दोष ॥
अष्टपदी
जिहि कारण गुरु कियो कहूँ कारण सभी ।
जासों रहौं दृढ़बैठि भयो धीरज तभी ॥
आगे भिक्षा काज ध्यान तजि डोलतो ।
कोऊ देतो भीख कोउ दुर्बोलतो ॥
जो कोउ भोजन दियो मगन होतो तहां ।
जो कोउ नाहीं दियो क्रोध करतो तहां ॥
अजगर इकदिन लखो जहां उतपति भयो ।
निशिदिन ठांईं रह्यो कहूं नाहीं गयो ॥
आंय अचानक मृगा सिंह वा मुख धँसै ।
चौपाये यौं आय तासु मुखमें फँसै ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७३
जो वह जागत होय उन्हें मुख सों गहै ।
तिनको भोजन करै उदर योंही भरै ॥
परालब्ध जो होय सोई ह्वां आरहै ।
परो रहै वहि ठौर सभी दुख सुख सहै ॥
वाकी लीनी रहनि बहुत सुखपाइया ।
चरणहिंदासा होय अधीर गँवाइया ॥
दो० जबसों पर आशा तजी, गृही द्वार नहिं जावँ ।
लगो रहौं हरि ध्यान में, सहज मिलै सो खावँ ॥
अष्टपदी ॥
मन राखौं प्रभु ध्यान सदा आनंदमें ।
ज्ञान दिशा अब भई रहो नहिं द्वन्दमें ॥
याचक घर घर फिरै न भिक्षा पावई ।
साधुनको वनमाहिं भोजन हरि ख्वावई ॥
जब भइ ऐसी समझ निचल बुधि आइया ।
जहँलग जिह्वा स्वाद सभी जु गँवाइया ॥
स्वादी अरु बिन स्वाद जो भोजन आवई ।
करि सब अंगीकार सुरुचि सों पावई ॥
सूखो गीलो होय जु भूनोहो कछू ।
ताको फेरौं नाहिं सभी लेकर भछूँ ॥
जो कछु आवै नाहिं ह्वांईं बैठो रहूँ ।
परालब्धही जानि बुरो भल ना कहूँ ॥
सकल बिकल नहिं होय न आशा कछु कहीं।
नारायण के ध्यान रहूँ लागो वहीं ॥
अजगर की सी वृत्ति निरी मेरे रही ।
२७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिंदासा होय भक्ति दृढ़करि गही ॥
दो० दशवें गुरु कियो सिन्धुको, कहूँ सोई परसंग ।
लीन्हे समझ बिचारिकै, जाके तीनों अंग ॥
अष्टपदी ॥
खारी नीर स्वभाव सदा इक रस वही ।
मीठी सरिता बहुत चली आवै बही ॥
मिलि नहिं फिरै स्वभाव तासु को जानिये ।
ऐसे विरकतरहै जगत में मानिये ॥
बहुतै होय गँभीर थाह नहिं पावई ।
ऐसा साधू जानि राम मन भावई ॥
वर्षाऋतुकी नदी रलैं बहु वादसों ।
घटै बढ़ वह नाहिं रहै मर्यादसों ॥
एकादश जो पतंग कहूँ मैं सुनायकै ।
देखि दीपकी ज्योति गिरैहै आयकै ॥
दीन्हो आप जराय हाथ कछु ना लगो ।
समुझि कामिनी रूप सो मैं दूरीभगो ॥
ज्ञान जाय अरु नरकपरै इस रीति को
सुन्दररूप निहारि करो मत प्रीति को ॥
दो० फूल फूलपर बैठिकै, उदर भरै तिस नाल ।
सो भवँरा गुरु बारवां, लई जू वाकी चाल ॥
अष्टपदी ॥
भिक्षा कारण मांगन घर घर जात हो ।
कोऊ देते आनि कोऊ जु रिसात हो ॥
ताते शिक्षा भवँर कि यह उरमें लही ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७५
सूक्ष्म सबही पुष्पसों उन रस मांगही ॥
तब में कियो विचार इकट्ठो लेनते ।
देनहार को दुःख बहुतही होत है ॥
नेक नेकही लेहु बहुत घरजायकै ।
उदर पूरणा करूं जु आनंद पायकै ॥
जितना होय अहार सोई अब लेत हौं ।
वासी नेक न राखि न काहू देत हौं ॥
अलिसुतकी यह रीति भूखभरि खावई ।
और दिना के काज न नेक वचावई ॥
फूलन को रस चाटि नहीं उनसों बँधै ।
ऐसे विरक्त रूप जगत में ना फँधै ॥
चरणहिंदासा होय त्याग मन राखई ।
राजा सों इहिभांति ऋषीश्वर भाखई ॥
दो० देखि दशा माँखीनकी, तजो सकल संग्रह ।
मिटिदुविधा निर्भयहुये, भई सुखारी देह ॥
अष्टपदी ॥
तेरह सहतकी माँखी ताहि पिछानियाँ ।
सब वृक्षनको मीठो इकठाँ आनियाँ ॥
जब छत्ता भयो पूर किसीने तोरिया ।
सब रस लीन्हो काढिकै वाहि मरोरिया ॥
बहुत भयो उन कष्ट जुवै भागी फिरीं ।
बहुत मरीं वहि ठावँ बहुत सिसकैं गिरीं ॥
ताते माँखी गुरू हिये माहीं धरो ।
कोउ जगकी वस्तुको संग्रह ना करो ॥
२७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौदह हाथी जानि काम वश होयकै ।
आपा आप बँधाय जन्म दियो खोयकै ॥
इक गज मातो हुतो जँगल के बीचही ।
अति बलवंत विशेषि कोऊ वा सम नहीं ॥
वा ढिग हस्ती और कोई नहिं जातहौ ।
मानुष पशुजिय योनि कहूं कह बातहौ ॥
वाकी आई बात जु राजापै चली ।
इक कुंजर वनमाहिं रहतहै अतिबली ॥
भूपति आज्ञादई पकरि वा लीजिये ।
जामें आवै हाथ यतन सोइ कीजिये ॥
दो० पीलवान आज्ञा लई, खोदी खंदक जाय ।
चरणदास तहाँ छल कियो, दीन्हीं घास बिछाय ॥
अष्टपदी ॥
भगल की हथिनि बनाय सँवारी बुद्धिसों ।
खंदक ऊपरधरी खरी करि शुद्धिसों ॥
जल पीवनके काज जु हस्ती आइया ।
वा हथिनीको देखिकै अधिक लोभाइया ॥
जब हथिनी की ओर चलो मतिहीनहीं ।
सपरश इच्छा धारि परो खंदकमहीं ॥
निकसन कैसे होय बहुत लंघन करे ।
अतिदुर्बल तन भयो पराक्रम सब हरे ॥
तब वापर चढ़ि बैठ महावत आयकै ।
बाहर लायो काढ़ि जु ताहि सधायकै ॥
फिर राजाके पास खड़ो कियो लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७७
अंकुश शिरके माहि जु बेड़ी पायँकै ॥
शीश धुनै पछिताय वै आनँद कितगये ।
जो सुख वनके माहिं सभी स्वप्ना भये ॥
सदाहुतो निर्बन्ध आय बंधन बँधो ।
कहैं चरणहींदास काम फंदन फँधो ॥
दो० सपरशकी इच्छा किये, भया जु ऐसा हाल ।
पशु पक्षी नर नारिही, फँसे कामके जाल ॥
अष्टपदी ॥
भाषत दत्तात्रेय जु साधूजन कभी ।
कामिनि ओर निहारि करै सपरश तभी ॥
हस्ती कैसो हाल साधुको होय है ।
सुमिरण ज्ञानरुध्यान जु सबही खोय है ॥
जो कहै हमहैं साधु जु कोई भार्या ।
चूमै हमरे चरण तासु होयहै कहा ॥
चरणन चूमै आय हाथ धरि पायँ पै ।
साधूमन चलिजाय स्पर्श सुख पायकै ॥
वाको सुख उरधारि करै इक कामिनी ।
वाते पुत्र कलत्र बहुतही यामिनी ॥
वनमें तप अरु योग जु करतो निशदिना ।
सो सबही गयो भूलि नहीं सुख इकछना ॥
ताते हस्ती गुरू हिये में धारिया ।
कामिनि को परसंग सकल निवारिया ॥
काठ कि पुतली होय कै कागज में रंची ।
चरणहिंदासाहोय सोभी देखन तजी ॥
॥७३॥
२७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पन्द्रहवों गुरु मृग कियो, ताकी गति सुनिलेहु ।
औगुणहीं को छोड़िकरि, गुणहीं में चितदेहु ॥
अष्टपदी ॥
मृग देखो वन माहिं तासु मति आनियां ।
जीव दियो वहि ठौर सोई हम जानियां ॥
वधिक बजाई बीण राग गावनलगो ।
सरवण सुनि वह हिरण रीझि आयो भगो ॥
पहुँचेा पारधि पास बाण उन मारिया ।
ता दिन रागको चाव सकल निवारिया ॥
जो विरक्त सुनै राग जु रस शृङ्गारको ।
ऐसहि होवै ख्वार नरकमें जायसो ॥
सुनिये गुण गोपाल चरित कर्त्तारको ।
जासों दुख छुटिजाय ये मायाजारको ॥
तासों उपजै ज्ञान ध्यान दृढ़ करि गहै ।
पावै पद निर्वाण जहां सुखसों रहै ॥
निश्चयही तू जान जु मैंने यह कही ।
चंचलता गह छूटि जु बुधि निश्चल भई ॥
ताना रीरी राग नाच बिसराइया ।
चरणहिंदासा होय चरण चित लाइया ॥
दो० कहूं सोलवीं मीनकी, बुरी जीभ की स्वाद ।
जो कोई यामें फँसै, लगै बहुत उठि व्याध ॥
अष्टपदी ॥
सोलहौं गुरु सुन मीन जो ऐसे देखिया ।
वा मच्छी को एक वधिक अवरेखिया ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७६
थोरो मांस लगाय जु बंशी साथही ।
जलमें दी छुटकाय डोर गहि हाथही ॥
जिह्या स्वाद के काज मीन वह खाइया ।
गई उदर के माहिं हिये अटकाइया ॥
तीक्ष्ण कांटा लोह उदरको फारिया ।
ताहीक्षण वह मीन प्राण तजि डारिया ॥
ताते मच्छी गुरू हिये माहीं करो ।
जिह्याको कछु स्वाद नहीं मनमें धरो ॥
जो विरक्त को स्वाद जीभको चाहिये ।
बहुत भांति दुख होय नहीं सुख पाइये ॥
जिह्या स्वाद के काज गृही घर जायहै ।
आछो भोजन पाय तौ रुचिसों खायहै ॥
भोंड़ो भोजन होंय तौ नाक चढ़ावई ।
हरि सुमिरण को त्यागिकै जिततित जावई ॥
ताते साधूलोग नहीं घर घर फिरैं ।
जिह्या को कछु स्वाद नहीं चितमें धरैं ॥
ऐसे भोजन खाय लखै ज्यों औषधी ।
सबही रोग नशाहिं रहै काया शुधी ॥
चीकन भोजन खाय नींद बहु आवई ।
ध्यान भजनकी रीति सकल बिसरावई ॥
सब इन्द्रिन के माहिं जो जिह्यावशकरै ।
जो आवै सोइ खाय कभूं भूखो रहै ॥
जो जिह्यावश होय तौ इन्द्री वश सबै ।
जो रसना वश नाहिं तौ सब परबल तबै ॥
चीकन भोजन खाय तौ इन्द्री सब जहां ।
२०
२८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अतिही है बलवन्त करें औगुण तहां ॥
षटरसही के स्वाद सों नारी वशभये ।
जग माहीं दुखपाय मुये नरकैगये ॥
मन्में देखि विचारि गुरू कियो मीनहूं ।
जासों लीनी सीख इन्द्रिभइ क्षीनहूं ॥
सबही स्वाद भुलाय शरण हरिकी लई ।
चरणहिंदासा होय सुरति निर्मल भई ॥
दो० सत्रहवों गुरु पिंगला, लीन्हों जासों ज्ञान ।
आशातजिनिर्मलभयो, लगो रहूं हरिध्यान ॥
अष्टपदी ॥
गुरु सत्रहवों जान हमारो पिंगला ।
पर आशा दइ छांड़ि रहूं आनँद मिला ॥
इक दिन राजा जनक विदेही के नगर ।
गयो अचानक लख्यो पिंगला को बगर ॥
पिंगला उठि परभात भली विधि न्हाइया ।
भूषण बस्तर पहिरि सुगन्ध लगाइया ॥
घरके द्वारे बैठि जु बाट निहारई ।
कोऊ दे बहु द्रव्य सु ह्वां पग धारई ॥
मारग में नर देखि यही आशा करै ।
आवतजानै ताहि खुशी हियमें धरै ॥
जब वह आयो नाहिं दुखी मनमें भई ।
कबहूं आश निराश ऐसही निशि अई ॥
ऐसे सब दिन बीतिगयो यहि भांतिही ।
मनमें भई मलीन आइ पुनि रातिही ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन २८१
काया आलस धारि जु घर भीतर गई ।
पलका बैठी जाय जहां भलि सेजही ॥
बिछे बिछौना श्वेत फूल तापर धरे ।
लेटी तहां मग जोय नैन निद्राभरे ॥
कबहूं उठिजा द्वार कभूं जा भीतरै ।
कहै चरणहींदास नींद नाहीं परै ॥
दो० आशाकी डोरी बँधी, क्षण घर में क्षण द्वार ।
थिरताना संतोषबिन, दुखी पिंगलानार ॥
अष्टपदी ॥
ऐसे आधीराति गई जब बीति कै ।
कोऊ आयो नाहिं सुहां कछु प्रीतिकै ॥
पिंगला उपजो ज्ञान हिये परकाशही ।
उदयभयो संतोष लोभ गयो नाशही ॥
वर्ष सहसदश माहिं जु तप कोऊ करै ।
हिरदै निर्मल होय सभी कलिमल हरै ॥
ऐसो ज्ञान उजास पिंगला को भयो ।
तब उन हिरदै माहिं वचन ऐसो कह्यो ॥
हीन हमारे भाग जन्म योंहीं गयो ।
मनुष रूपसों काम क्रोध लोभै छयो ॥
ताते जिविका आप हिये में चाहिया ।
परमातम भगवान सों प्रीति न लाइया ॥
सदा विराजत निकट दूरि नहिं होतहै ।
सबविधि पूरणकाम सकल जग ज्योतिहै ॥
सबहीको नित देतु खान अरु पानई ।
चरणहिंदासा होय सोई यह जानई ॥
२८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० लख चौरासी योनि में, सवको भोजन देय ।
सदा वही पालन करै, अपनो नाम न लेय ॥
अष्टपदी ॥
मनुषरूप जो देय एकदिन खानको ।
दूजे दिन वह बहुत घटावै मानको ॥
नारायण सों भक्ति जो जगको सुख चहै ।
ऐसे वाको देय सदा एकरस रहै ॥
जाके लीन्हे नाम सकल पातक नसैं ।
कथा जु उनकी सुनै हिये आनँद लसैं ॥
ऐसो हरि विसराय मनुषको चाहिया ।
विरथा जन्म गवाँयकै सुख नहिं पाइया ॥
काया है इक गेह हाड़ अरु मांस को ।
नाड़ी गुणसों बांधि रखो है तासु को ॥
चामरु लोहू पीब तहां नव द्वारहैं ।
सदा बहतही रहत यही जु विचारहैं ॥
विष्ठा मूत जो होय या गेहके माहिंहीं ।
ऐसे घरसों भोग मुदित मन चाहहीं ॥
ऐसे विरथा आयु सकल जु गवाँइया ।
हरि के चरणनदास नहीं जु कहाइया ॥
दो० अब उरमें ऐसी उठी, करूं भक्ति चितलाय ।
चरणकमल में मन धरूं, जगसों नेह उठाय ॥
अष्टपदी ॥
• अब करूं भक्ति उपाय जु हरि मनभाइया ।
ताते लेहुं रिझाय परमगुण गाइया ॥
जैसे लछमी सेव करी मन लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८३
कीन्हे महाप्रसन्न श्रीपति धायकै ॥
ऐसे मन भगवान सों अपनौ लायलौं ।
पावों पुरुष निधान प्रीतिके भायहौं ॥
लछमी करी जु भक्ति पुराणन में कहैं ।
नारायण दई ठौर सदा हियमें रहें ॥
मैंहूं ऐसी भक्ति करूं अतिप्रेम सों ।
करूं महापरसन्न अधिकही नेमसों ॥
आज के दिनसे आश पुरुष की त्यागिकै ।
राखूं प्रभुकी चाह चरणहीं लागिकै ॥
जो कछु हरि मोहिं देयँ सोई निर्दोषहै ।
करूं भजन भगवन्त तासु सों मोपहै ॥
मनुष रूप कह वस्तु जु आशा कीजिये ।
बहुत वहाँलों देत जहाँलों जीजिये ॥
दो० दुख में काम न आवई, मुये न संगी कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, ये संसारी लोय ॥
अष्टपदी ॥
जब वह मृतक होय नहा कछु हेत है ।
हरि जु सदाही संग सभी सुधिलेत है ॥
मनुष आपनी नाहिं जु इच्छा करिसकै ।
औरन को कहा देय मूर्ख योंहीं तकै ॥
पिंगला कहो यह ज्ञान मुझे क्यों आइया ।
नीके काजन माहिं न चित्त लगाइया ॥
तीरथ बर्त्त न साधू दर्शन देखिया ।
हौं तिरिया बुरे कर्म कि चाल विशेषिया ॥
पुरुषोत्तम की दया मों यह पहिचानिये ।
२८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात कछु नाहिं हिये में आनिये ॥
जो कोई कहै आज कछू धन ना लयो ।
कोई आयो नाहिं ज्ञान ताते भयो ॥
आगेहू बहुदिवस कोई नहिं आइया ।
कीन्हे लंघन बहुत द्रव्य नहिं पाइया ॥
ज्ञान कबहु नहिं भयो आज जानत नहीं ।
कौन भाग बड़ मोर भयो परगट अभी ॥
कहैं गुरू शुकदेव जु उन नहिं जानियाँ ।
दत्तात्रेय के दर्शसों कुमति भुलानियाँ ॥
दो० पिंगला आई घर बिषे, छोड़ि मनुषकी आश ।
सुखी होय सोवन लगी, जब वह भई निराश ॥
अष्टपदी ॥
मनमें किय सन्तोष सकल दुख मिटिगये ।
छोड़ी जग की आश हिये आनंद छये ॥
यों कहैं दत्तात्रेय राजासों यही ।
वाकी मैं लइ सीख सोई दृढ़ करि गही ॥
गृही द्वार नहिं जावँ न मांगौं कछु कहूं ।
ताते सुखी अरु शान्त सदा बैठोरहूं ॥
उद्यम करूं कछु नाहिं वासना त्यागिकै ।
आनंद तन मन मोहिं बहुत अनुरागकै ॥
मनुष दुखी वहि होय रहै आशा लिये ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह उतपति किये ॥
जो आशा मन आय कबहु वह नाभई ।
क्रोध भयो उत्पत्ति यही मनसा ठई ॥
काहूते इकवस्तु कभू जु मँगाइया ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८५
वाने दीन्हीं नहिं क्रोध उपजाइया ॥
वाते कीन्हों वैर अधिक रिस ठानिया ।
नारायणके ध्यान सुरति नहिं आनिया ॥
यह शिक्षा लइ मानि पिंगलासे तभी ।
जगकी छोड़ी आश भये कारज सभी ॥
दो० चील्ह अठरहों गुरु कियो, मिटो सकल सन्देह ।
रहौं अकेलो संग तजि, करौं न कछु संग्रह ॥
अष्टपदी ॥
जब गृहसेती निकसि वैरागी हम भये ।
तब हमरे मनमाहिं जु ये कारज छये ॥
दो भाजन सँग होहिं एक जल पीजिये ।
दूजे भाजन माहिं खानको लीजिये ॥
इक चादर कोपीन दोय यह चाहिये ।
ताते ओढ़ि नहान किं युक्ति बनाइये ॥
करिकै जब अस्नान ध्यान करने लगो ।
मनमें चिन्ता कोऊ कोपीनहिं लै भगो ॥
समझो यह मनमाहिं बहुत अधिकारते ।
अन्त महादुख होय मोह उरधार ते ॥
ऊंची पदवी पाय बहुरि नीचे परै ।
जब वह संपत जाय घनो मनमें झुरै ॥
जो कोइ रहै इकन्त अकेलोई सहै ।
ताहि उदर को शोच कछू नाहीं रहै ॥
दशबिस सौ जो साथ अधिक दुख लहत है ।
आप अकेलो रहै परमसुख सहत है ॥
२८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सकल विकल बिसराय जु आनँद पावई ।
चरणहिंदासा होयकै बोझ बगावई ।
दो० उड़ती देखी चील्ह को, पंजे माहीं मांस ।
बहु पक्षी घेरे फिरैं, लेन न देवैं श्वास ॥
अष्टपदी ॥
पक्षी सभी लुभाहि मांसको देखिकै ।
वाको मारै चोंच जु लोभ विशेषिकै ॥
कोई नोचै पंख कोई मस्तक भनै ।
वह दुख पावै बहुत समझि मूड़ी धुनै ॥
मैं काहूसे वैर प्रीति नहिं मानिया ।
या भक्षण के काज कष्टही जानिया ॥
मांस दियो छिटकाय जुदे पक्षी भये ।
वा भक्षण के पास सभी दौरे गये ॥
वह बैठी मन मुदित जु पंख पसारिकै ।
दीन्ह्यो दुख बिसराय जु व्याधा टारिकै ॥
वा दिनते लइ सीख जु संग्रह ना करौं ।
कछू न राखौं पास नग्न तन मैं फिरौं ॥
जहँ चाहूँ तहँ जावँ भजन आनन्द में ।
कछु मन चिन्ता नाहिं छुटो सब बन्धते ॥
काहू वस्तु न शोच कोई लैजायगो ।
चरणहिंदासा होय ध्यान हरिपाय को ॥
दो० बालक गुरु उन्नीसवों, ताके लिये स्वभाव ।
नहीं मान अपमान है, लोभ न कछू उपाव ॥
अष्टपदी ॥
बालक माहीं नहीं मान अपमानहूं ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८७
लोभ जु वामें नाहिं रहै अनजानहूं ॥
मारै कोई वाहि रोष वह ना करै ।
करै जु फिरि वह प्यार बाल हँसि हँसि परै ॥
निन्दा अस्तुति दोय कभी नहिं धारई ।
वैर प्रीतिको अङ्ग कछू न विचारई ॥
जो मणि बहुतै मोल कि वासे लीजिये ।
खेल खिलौना फूलको पलटे दीजिये ॥
मणिको लोभ न करत कछू नहिं भाषई ।
चितको अपने खेलके माहीं राखई ॥
जो कोउ नारी पकरि हिये सों लागई ।
बालक अरु वा नारिको काम न जागई ॥
नग्न जु बालक फिरत लाज नहिं आवई ।
ज्यों भावै त्यों रहै कोई न चलावई ॥
क्रिया कर्म अरु सकुच कछू वाके नहीं ।
ठाकुर अरु चरणदास कछू जानै नहीं ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जी, राजासों यह बैन ।
इकदिन बालक की सबै, देखी अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय बालगति देखिकै ।
वाकेलिये स्वभाव सभी जु विशेषिकै ॥
जो कहुँ हमसों प्रीति बहुत आदर कियो ।
काहूं गारी काढ़ि बहुत झड़को दियो ॥
दोनों एक समान और नहिं व्यापई ।
बैठूं सहज स्वभाव उठूं फिर आपई ॥
जो किन्हूं भोजन दियो चाटिहाई लियो ।