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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 690 में से

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पृष्ठ 318

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७६
थोरो मांस लगाय जु बंशी साथही ।
जलमें दी छुटकाय डोर गहि हाथही ॥
जिह्या स्वाद के काज मीन वह खाइया ।
गई उदर के माहिं हिये अटकाइया ॥
तीक्ष्ण कांटा लोह उदरको फारिया ।
ताहीक्षण वह मीन प्राण तजि डारिया ॥
ताते मच्छी गुरू हिये माहीं करो ।
जिह्याको कछु स्वाद नहीं मनमें धरो ॥
जो विरक्त को स्वाद जीभको चाहिये ।
बहुत भांति दुख होय नहीं सुख पाइये ॥
जिह्या स्वाद के काज गृही घर जायहै ।
आछो भोजन पाय तौ रुचिसों खायहै ॥
भोंड़ो भोजन होंय तौ नाक चढ़ावई ।
हरि सुमिरण को त्यागिकै जिततित जावई ॥
ताते साधूलोग नहीं घर घर फिरैं ।
जिह्या को कछु स्वाद नहीं चितमें धरैं ॥
ऐसे भोजन खाय लखै ज्यों औषधी ।
सबही रोग नशाहिं रहै काया शुधी ॥
चीकन भोजन खाय नींद बहु आवई ।
ध्यान भजनकी रीति सकल बिसरावई ॥
सब इन्द्रिन के माहिं जो जिह्यावशकरै ।
जो आवै सोइ खाय कभूं भूखो रहै ॥
जो जिह्यावश होय तौ इन्द्री वश सबै ।
जो रसना वश नाहिं तौ सब परबल तबै ॥
चीकन भोजन खाय तौ इन्द्री सब जहां ।
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