भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० लख चौरासी योनि में, सवको भोजन देय ।
सदा वही पालन करै, अपनो नाम न लेय ॥
अष्टपदी ॥
मनुषरूप जो देय एकदिन खानको ।
दूजे दिन वह बहुत घटावै मानको ॥
नारायण सों भक्ति जो जगको सुख चहै ।
ऐसे वाको देय सदा एकरस रहै ॥
जाके लीन्हे नाम सकल पातक नसैं ।
कथा जु उनकी सुनै हिये आनँद लसैं ॥
ऐसो हरि विसराय मनुषको चाहिया ।
विरथा जन्म गवाँयकै सुख नहिं पाइया ॥
काया है इक गेह हाड़ अरु मांस को ।
नाड़ी गुणसों बांधि रखो है तासु को ॥
चामरु लोहू पीब तहां नव द्वारहैं ।
सदा बहतही रहत यही जु विचारहैं ॥
विष्ठा मूत जो होय या गेहके माहिंहीं ।
ऐसे घरसों भोग मुदित मन चाहहीं ॥
ऐसे विरथा आयु सकल जु गवाँइया ।
हरि के चरणनदास नहीं जु कहाइया ॥
दो० अब उरमें ऐसी उठी, करूं भक्ति चितलाय ।
चरणकमल में मन धरूं, जगसों नेह उठाय ॥
अष्टपदी ॥
• अब करूं भक्ति उपाय जु हरि मनभाइया ।
ताते लेहुं रिझाय परमगुण गाइया ॥
जैसे लछमी सेव करी मन लायकै ।