भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७३
जो वह जागत होय उन्हें मुख सों गहै ।
तिनको भोजन करै उदर योंही भरै ॥
परालब्ध जो होय सोई ह्वां आरहै ।
परो रहै वहि ठौर सभी दुख सुख सहै ॥
वाकी लीनी रहनि बहुत सुखपाइया ।
चरणहिंदासा होय अधीर गँवाइया ॥
दो० जबसों पर आशा तजी, गृही द्वार नहिं जावँ ।
लगो रहौं हरि ध्यान में, सहज मिलै सो खावँ ॥
अष्टपदी ॥
मन राखौं प्रभु ध्यान सदा आनंदमें ।
ज्ञान दिशा अब भई रहो नहिं द्वन्दमें ॥
याचक घर घर फिरै न भिक्षा पावई ।
साधुनको वनमाहिं भोजन हरि ख्वावई ॥
जब भइ ऐसी समझ निचल बुधि आइया ।
जहँलग जिह्वा स्वाद सभी जु गँवाइया ॥
स्वादी अरु बिन स्वाद जो भोजन आवई ।
करि सब अंगीकार सुरुचि सों पावई ॥
सूखो गीलो होय जु भूनोहो कछू ।
ताको फेरौं नाहिं सभी लेकर भछूँ ॥
जो कछु आवै नाहिं ह्वांईं बैठो रहूँ ।
परालब्धही जानि बुरो भल ना कहूँ ॥
सकल बिकल नहिं होय न आशा कछु कहीं।
नारायण के ध्यान रहूँ लागो वहीं ॥
अजगर की सी वृत्ति निरी मेरे रही ।