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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 690 में से

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पृष्ठ 307

२६८ ˙ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै।
कला घटै अरू बढ़ै मावस लगना रहै॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरहीं॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय॥
अष्टपदी॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है।
कबहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिक्षा दोलई।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही॥