भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७१
अष्टपदी ॥
दोऊ गये वनमाहिं वधिक इक आइया ।
उन बचनको देखिकै जाल बिछाइया ॥
तापर किणका डारि आपतौ छिपिरह्यो ।
बचन चूगा देखि भेद कछु ना लह्यो ॥
यह कण कारण मात पिता वनको रमै ।
सो पायो यहि ठौर चुगैं क्यों ना हमै ॥
दोऊ उतरे तहां जबै मुख डारिया ।
तब वहि वधिकने जाल फंदकों मारिया ॥
आय कपोतिनि जबै शब्द नाहीं सुनो ।
घरमें पाये नाहि शीश तबहीं धुनो ॥
बचन कारण शब्द कियो हंकारिकै ।
बोले पिंजर माहिं जु वचन निहारिकै ॥
देखि कपोतिनि जालमें यह मन आनिया ।
अपना जीवन अफल जगतमें जानिया ॥
तनमें अतिदुख पाय कल्पना बहु करी ।
कहैं चरणहींदास बुरी आशा धरी ॥
दो० जाल माहिं मोसुत फँसे, जाय परौं वा ठौर ।
विकल होय चाली तबै, कियो विचार न और ॥
अष्टपदी ॥
मोह फंद वश होय जाल माहीं परी ।
वाहू को गहि वधिक पिंजर माहीं धरी ॥
आयो बहुरि कपोत लख्यो सुत बालहूँ ।
इन बिन कैसे जिऊं मरौं बेहालहूँ ॥