भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पन्द्रहवों गुरु मृग कियो, ताकी गति सुनिलेहु ।
औगुणहीं को छोड़िकरि, गुणहीं में चितदेहु ॥
अष्टपदी ॥
मृग देखो वन माहिं तासु मति आनियां ।
जीव दियो वहि ठौर सोई हम जानियां ॥
वधिक बजाई बीण राग गावनलगो ।
सरवण सुनि वह हिरण रीझि आयो भगो ॥
पहुँचेा पारधि पास बाण उन मारिया ।
ता दिन रागको चाव सकल निवारिया ॥
जो विरक्त सुनै राग जु रस शृङ्गारको ।
ऐसहि होवै ख्वार नरकमें जायसो ॥
सुनिये गुण गोपाल चरित कर्त्तारको ।
जासों दुख छुटिजाय ये मायाजारको ॥
तासों उपजै ज्ञान ध्यान दृढ़ करि गहै ।
पावै पद निर्वाण जहां सुखसों रहै ॥
निश्चयही तू जान जु मैंने यह कही ।
चंचलता गह छूटि जु बुधि निश्चल भई ॥
ताना रीरी राग नाच बिसराइया ।
चरणहिंदासा होय चरण चित लाइया ॥
दो० कहूं सोलवीं मीनकी, बुरी जीभ की स्वाद ।
जो कोई यामें फँसै, लगै बहुत उठि व्याध ॥
अष्टपदी ॥
सोलहौं गुरु सुन मीन जो ऐसे देखिया ।
वा मच्छी को एक वधिक अवरेखिया ॥