भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सकल विकल बिसराय जु आनँद पावई ।
चरणहिंदासा होयकै बोझ बगावई ।
दो० उड़ती देखी चील्ह को, पंजे माहीं मांस ।
बहु पक्षी घेरे फिरैं, लेन न देवैं श्वास ॥
अष्टपदी ॥
पक्षी सभी लुभाहि मांसको देखिकै ।
वाको मारै चोंच जु लोभ विशेषिकै ॥
कोई नोचै पंख कोई मस्तक भनै ।
वह दुख पावै बहुत समझि मूड़ी धुनै ॥
मैं काहूसे वैर प्रीति नहिं मानिया ।
या भक्षण के काज कष्टही जानिया ॥
मांस दियो छिटकाय जुदे पक्षी भये ।
वा भक्षण के पास सभी दौरे गये ॥
वह बैठी मन मुदित जु पंख पसारिकै ।
दीन्ह्यो दुख बिसराय जु व्याधा टारिकै ॥
वा दिनते लइ सीख जु संग्रह ना करौं ।
कछू न राखौं पास नग्न तन मैं फिरौं ॥
जहँ चाहूँ तहँ जावँ भजन आनन्द में ।
कछु मन चिन्ता नाहिं छुटो सब बन्धते ॥
काहू वस्तु न शोच कोई लैजायगो ।
चरणहिंदासा होय ध्यान हरिपाय को ॥
दो० बालक गुरु उन्नीसवों, ताके लिये स्वभाव ।
नहीं मान अपमान है, लोभ न कछू उपाव ॥
अष्टपदी ॥
बालक माहीं नहीं मान अपमानहूं ।