सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 315

२७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।

चौदह हाथी जानि काम वश होयकै ।
आपा आप बँधाय जन्म दियो खोयकै ॥
इक गज मातो हुतो जँगल के बीचही ।
अति बलवंत विशेषि कोऊ वा सम नहीं ॥
वा ढिग हस्ती और कोई नहिं जातहौ ।
मानुष पशुजिय योनि कहूं कह बातहौ ॥
वाकी आई बात जु राजापै चली ।
इक कुंजर वनमाहिं रहतहै अतिबली ॥
भूपति आज्ञादई पकरि वा लीजिये ।
जामें आवै हाथ यतन सोइ कीजिये ॥
दो० पीलवान आज्ञा लई, खोदी खंदक जाय ।
चरणदास तहाँ छल कियो, दीन्हीं घास बिछाय ॥
अष्टपदी ॥
भगल की हथिनि बनाय सँवारी बुद्धिसों ।
खंदक ऊपरधरी खरी करि शुद्धिसों ॥
जल पीवनके काज जु हस्ती आइया ।
वा हथिनीको देखिकै अधिक लोभाइया ॥
जब हथिनी की ओर चलो मतिहीनहीं ।
सपरश इच्छा धारि परो खंदकमहीं ॥
निकसन कैसे होय बहुत लंघन करे ।
अतिदुर्बल तन भयो पराक्रम सब हरे ॥
तब वापर चढ़ि बैठ महावत आयकै ।
बाहर लायो काढ़ि जु ताहि सधायकै ॥
फिर राजाके पास खड़ो कियो लायकै ।