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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 690 में से

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पृष्ठ 323

२८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात कछु नाहिं हिये में आनिये ॥
जो कोई कहै आज कछू धन ना लयो ।
कोई आयो नाहिं ज्ञान ताते भयो ॥
आगेहू बहुदिवस कोई नहिं आइया ।
कीन्हे लंघन बहुत द्रव्य नहिं पाइया ॥
ज्ञान कबहु नहिं भयो आज जानत नहीं ।
कौन भाग बड़ मोर भयो परगट अभी ॥
कहैं गुरू शुकदेव जु उन नहिं जानियाँ ।
दत्तात्रेय के दर्शसों कुमति भुलानियाँ ॥
दो० पिंगला आई घर बिषे, छोड़ि मनुषकी आश ।
सुखी होय सोवन लगी, जब वह भई निराश ॥
अष्टपदी ॥
मनमें किय सन्तोष सकल दुख मिटिगये ।
छोड़ी जग की आश हिये आनंद छये ॥
यों कहैं दत्तात्रेय राजासों यही ।
वाकी मैं लइ सीख सोई दृढ़ करि गही ॥
गृही द्वार नहिं जावँ न मांगौं कछु कहूं ।
ताते सुखी अरु शान्त सदा बैठोरहूं ॥
उद्यम करूं कछु नाहिं वासना त्यागिकै ।
आनंद तन मन मोहिं बहुत अनुरागकै ॥
मनुष दुखी वहि होय रहै आशा लिये ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह उतपति किये ॥
जो आशा मन आय कबहु वह नाभई ।
क्रोध भयो उत्पत्ति यही मनसा ठई ॥
काहूते इकवस्तु कभू जु मँगाइया ।