सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

२८८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करही को करपत्र पानी तामें पियो ॥
अष्टधातु कों लोभत्याग सबही कियो ।
कैसोहि बस्तरदेहु छांड़ि तितही दियो ॥
ज्यों बालक निज खेलमें आनँदसों रहै ।
त्यों परमातम संग कछू दुखहू न भै ॥
तुरिया पद निर्वाण मातु समहीं कहूँ ।
ताकी गोदी माहिं सदा सुखसों रहूँ ॥
चरणहिंदासा होयकै गर्व नशाइया ।
छोटापन के अंग सबै तब आइया ॥
दो० कन्या गुरु कियो बीसवों, समझि विचारिकै देखि ।
रहौ अकेलो तभीसों, पायौ यही विवेक ॥
अष्टपदी ॥
पुण्य तू बिसवों जान गुरू कन्या कियो ।
वाको मत अनुराग हिये माहीं लियो ॥
इक नगरी के माहिं एक दिन हम गये ।
इक गृहचारी के गेह जाय ठाढ़े भये ॥
स्यानी कन्या तासु जु घरमाहीं हुती ।
मात पिता केहु काज गवन कीन्हों तभी ॥
करन सगाई आय लोग बैठे तहीं ।
या कन्याकी करें सगाई आजहीं ॥
कन्या कीन्हों सोच यही कैसे कहूँ ।
मात पिता कहिं गये अकेली मैं अहूँ ॥
ऐहैं मातरु पिता चिन्त मनमें करैं ।
भोजन को कछु नाहिं जु हम आगे धरैं ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८६
कन्याकरिकै शोच ये वचन उचारिया ।
मात पिता गये कहीं अभी पगधारिया ॥
आवो बैठौ खाट रसोई खाइये ।
भोजन होत सवार कहों नहिं जाइये ॥
वाके गृह कछु नाहिं धान थोरे हुते ।
कूटनलागीं ताहि सोई अपने मते ॥
चूरी हाथके माहिं बहुत खरकन लगीं ।
फिरि समझि मनमाहिं शोचमाहीं पगीं ॥
यों समझैं ये लोग कछू गृहमें नहीं ।
भोजन कारन धानजु कूटति है तहीं ॥
चूरीडारी फोरि दोय तहँ राखिया ।
तऊ न खरको गयो शब्दही भाषिया ॥
दूजी दइ बिगसाय एकही रहगई ।
तब खरका नहिं होय कुटत निर्भय भई ॥
वादिन कन्या गुरू जु हमने चितधरा ।
साधु अकेलों रहै सदा आनँद भरा ॥
धर्मशाला ते निकसि शिष्य को साथलै ।
कबहुँ उपजै क्रोध शिष्य भाषै यहै ॥
आपनहीं लियो बहुत हमें थोरो दियो ।
गुरूको चहिये टहल शिष्य रूठै गयो ॥
गुरू कहै कछु और शिष्य औरै कहै ।
झगड़ै आपस माहिं प्रीति थिर ना रहै ॥
दोउमें कलकल होय शान्ति नहिं आवई ।
विना अकेलेरहे चैन नहिं पावई ॥
पशु पक्षी नर नारि संग नहिं लीजिये ।

२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूजेही को साथ सभी तजि दीजिये ॥
छूटैं सकल कलेश ध्यानलागै भलो ।
चरणहिं दासा होय रहै हरिसों मिलो ॥
दो० गुरु कीन्हो इक्कीसवों, ताहि तीरगर जान ।
चरणदास यों कहतहैं, वासों सीखो ध्यान ॥
अष्टपदी ॥
पुनि इक्कीसवों गुरू तीरगर हमकियो ।
ताते ध्यानको भेद सीखि हिय में लियो ॥
इकदिन नगरीमाहिं तीरगर हाट में ।
ठाढ़भयो तहँजाय चलतही वाट में ॥
वह तौ बनावत तीर अपनी जानमें ।
और कछू सुधि नाहिं पगो वा ध्यानमें ॥
वाके आगे होय भूप इक आइया ।
हस्ती अरु दल साज निशान बजाइया ॥
भयो मुहूरत एक मनुष तहँ आइकै ।
भूप गयो इस राह बुझो जु सुनायकै ॥
वह तौ साजत तीर यही उत्तर दियो ।
हम तौ जानत नाहिं नहीं दरशन कियो ॥
भाषत दत्तात्रेय जु हम वासों कह्यो ।
राजा सँग बहु भीर शब्द दुन्दुभि भयो ॥
बहुत कटक लिये साथ जु भूप सिधारिया ।
तैं काहे नहिं सुनो न दृष्टि निहारिया ॥
उन यों उत्तर, दियो तीरके ध्यानहीं ।
सुरतिरही तेहि माहिं याते नहिं जानहीं ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
वाको कीन्हो गुरू हियेमें धारिकै ।
मन हरिचरणन पास रखूं निर्धारिकै ॥
दृष्टि मना अरु बुद्धि जहां जु लगाइया ।
ऐसो कहिये ध्यान विरल कहूँ पाइया ॥
दो० ध्यान करै दृग मूंदि करि, जो कोई नर नार ।
खटका सुनि पलकैं खुलैं, मन चल वारंवार ॥
अष्टपदी ॥
वह नहिं कहियत ध्यान जु खुलि खुलि जात है ।
निश्चल लागै ध्यानजु पूरी बात है ॥
ध्याता ध्यान के बीच ध्यान ध्येय माहिं है ।
तीनौ एकहि होहिं विघ्न कछु नाहिं है ॥
मन हरिचरणन पास कायाकी सुधि नहीं ।
भूखप्यास कछु नाहिं ध्यान लागत तहीं ॥
मन गयो औरै ठावैँ ध्यान जो लाइये ।
सो वह डिगि डिगि जाय न थिरता पाइये ॥
जब नारायण साथ मगन मन है-गयो ।
सबकारज गयो भूलि कछू सुधि ना रह्यो ॥
जैसे भाषत लोय समाधी पुरुष को ।
दिन बीतैं दश बीस नहीं सुधि बुधि कहूँ ॥
कहिये यही समाधि वासना सब जरैं ।
कोटिन मध्ये एक ध्यान एसो धरैं ॥
सोई चरणको दास सोई योगीश है ।
सोइ साधक सोइ सिद्ध जु विस्वेबीस है ॥
दो० ध्यानी ध्यान लगायकै, रहै राम लवलाय ।
आपा बिसरै हरिमिलैं, बहुरि न उपज आय ॥

२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
तनकी सुधि बिसराय कछू सुधि ना रहे ।
या विधिसे जो करै ध्यान ताको कहै ॥
हलचल ध्यान जो करै सो हरिसों ना मिलै ।
अफल ध्यान सोइहोय जो मनक्षणक्षणचलै ॥
तीर बनावनहार गुरू हमने कियो ।
ताते यह उपदेश हिये माहीं लियो ॥
ऐसे मन को साधि प्रभू चरणन धरै ।
ह्वांहीं रहै चितलाय जु इतउत ना फिरै ॥
बाइसवों गुरु सांप हमारो जानिये ।
ताते लीन्ही सीख यही पहिचानिये ॥
सदा अकेलो रहै कबौं घर ना करै ।
रैनि जहाँ कहुँ होय वहीं वह बसि रहै ॥
वाकी देखी रहनि जु मनमें लाइया ।
सदारहूँ निर्बंध न मन्दिर छाइया ॥
उपजो मोह न लोभ लगे नहिं दाग है ।
चरणहिंदासा भयो द्वेष नहिं राग है ॥
दो० बँधा जु पानी गांदला, चलता निर्मल होय ।
दोनों रीति विचारिकै, भलो होय सो लोय ॥
तेइसवों मकरी गुरू, उगलि तार भखि जाय ।
ऐसे जग परकाश करि, प्रभुले आप लुकाय ॥
अष्टपदी ॥
तेइसवों गुरु जान हमारो माकरी ।
आप सों काढै तार रहै वामो खरी ॥
फिरि वह तार समेटि लेय उरमें धरै ।

यों हरिलीला जानिय कौतुक सो करै ॥
वसुधाको उपजाय करै पालन जभी ।
फिरि सब लेय मिलाय आप माहीं तभी ॥
जैसे मकरी तारसों जाल बनाइया ।
फिरि आपन वा बीचमें सहज समाइया ॥
जब चाहै वह जाल उदरमें लै धरै ।
मच्छी जाल में फँसै सो नहीं ऊबरै ॥
भाषैं दत्तात्रेय मुक्ति जो चाहिये ।
हरि उतपति क्षय करन शरनमें आइये ॥
जन्म मरण भयमानि भक्ति में पागिये ।
जगके जालसों छूटि वेगिही भागिये ॥
लीजै त्यागि वैराग चरणहीं दास हो ।
हरियश हरिगुण गाय तजो जग वासहो ॥
दो० भृङ्गी मिलि भृङ्गी भवै, सुनो हतो यह बैन ।
अब मन आई सांचही, देखा अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबिसवों गुरु कियो जु भृङ्गी जानिकै ।
वासों निश्चय भई हिये में आनिकै ॥
सुनीहती यह बात जु कोई हरिभजै ।
निशिदिन मन ह्वां लायकै प्रभुसेवा सजै ॥
सो नारायणरूप आप ह्वै जात है ।
यामें संशय नाहिं सांच यह बात है ॥
मन ठहरत ना हुती ये बात सुहावनी ।
सेवक जो कोइ होय सो क्यों होवै धनी ॥
भृङ्गी को हम लखो कीट इक आनिकै ।

२६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राखो उन गृह माहिं आपनो जानिकै ॥
आपन बाहर बैठि ताहि सम्मुख कियो ।
केतक दिवसन माहिं व भृङ्गी करि लियो ॥
भृङ्गी रूपको देखिकै भृङ्गी ह्वै गयो ।
ताते भृङ्गी गुरू हमारे मल छयो ॥
जैसे करै कोइू ध्यान सो वा सम होतहै ।
नहींरहै चरणदास रहै ब्रह्मज्योतिहै ॥
दो० चौबीसौ पूरेकिये, समझिसमझिकरि देखि ।
विरक्त ह्वै जग में रहूं, लगै न माया रेखि ॥
फिरि अपनी कायालखी, रही न जासों प्रीति ।
थके जु इन्द्री स्वाद ही, सहज गई सबरीति ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय गुरू इक देह है।
पहिले मोको होतो अधिक सनेहमै ॥
देखो क्षण क्षण देह क्षीण ह्वै जातही ।
नित उठि सुखके काज भला कुछ खातही ॥
बहुत चाव करि आप भलो भोजन कियो ।
दूजे दिन वहि भांति घनोही दुख दियो ॥
इकदिन बस्तर विमल बनाये लायकै ।
फिरि बस्तरके काज फिरूं दुख पायकै ॥
जितनो कियो उपाय काया सुखकाजही ।
कबहूं सुख ना भयो फिरत बेलाजही ॥
इकदिन एक उपाय जु सुखको धारिया ।
दूजेदिन वहि दुःख बहुत विस्तारिया ॥
और लखी यह बात यह काया आपनी ।

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
अपनीही होव नाहिं विचारीही धनी ॥
मूरख जानै नाहिं सुयाही भेद को ।
होव ना चरणदास सहै बहु खेद को ॥
दो० बालपने अरु तरुणमें, और बुढ़ापे माहिं ।
तीनो पनमें देह यह, कबहुँ अपनी नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
बालकपनमें हाथ बाप अरु मायकै ।
तरुणापन में फँसै त्रिया कर जायकै ॥
वृद्ध अवस्था माहिं पुत्रके हाथहीं ।
पुनि जब मृतकहोय अगिनि जारै तहीं ॥
जो थोंहीं रहिजाय पशू आदिक भखैं ।
देह न अपनी होय ज्ञान मांही लखैं ॥
वादिन ते सुखकाज नहीं श्रमधारिया ।
परालब्ध जो आय उदरमें डारिया ॥
कायाते इककाज भलो पुनि होत है ।
हरि की प्रापत होय जु ज्ञान उदोत है ॥
मृत्यु जबहिं होयजाय य काया ना रहै ।
भारे कैसो गेह जीव काया लहै ॥
जबहीं आवै काल नहीं ठहरायगो ।
खर्चे जो बहु द्रव्य न क्षण रहि जायगो ॥
जबहीं समुझो ज्ञान देहको जीय में ।
भयो विरक्त विचार आपने हीय में ॥
लई सीख चौबीस देहहित त्यागिकै ।
कीन्हो हरिको ध्यान बहुत अनुरागिकै ॥
२१

३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दत्तात्रेय ये बचन कहे बहु चावसों ।
पुनि तीर्थन को गये भक्तके भावसों ॥
राजा सुनि यह ज्ञान हिये में धारिया ।
हरिसों सुरति लगाय सकल दुख टारिया ॥
चरणहिं दासा होय परमसुखही लियो ।
तन को जगमें राखि जु मन हरिको दियो ॥
दो० दत्तात्रेयी ने कहे, जो राजा से वैन ।
सो मैं भाषा में कियो, समझो पावो चैन ॥
अष्टपदी ॥
चौबीसों के माहिं होय उपदेशदै ।
सतगुरु वाहि उबारि किये सब दूरि भै ॥
उन्हीं के परताप चौबीसौ समझही ।
आई घटके माहिं जु उज्ज्वल बुद्धिही ॥
चौबीसौ तनधारि जु अंग बताइया ।
जासों भयो कल्याण अधिक सुख पाइया ॥
ऐसे हैं गुरुदेव ये निश्चय जानिये ।
सकल विकल सब छोड़ि गुरुही मानिये ॥
गुरुही के परसाद मिलैं नारायणा ।
जन्म मरण बँध छूटि होय पारायणा ॥
समरथ श्री गुरुदेव शीशपर राखिये ।
भवसागर की व्याधि सकलही नाखिये ॥
कहैं मुनी शुकदेव चरणहींदास को ।
वही जु पावै चौथे परमनिवास को ॥
दो० गुरु समान तिहुँलोक में, और न दीखै कोय ।
नाम लिये पातक नशैं, ध्यान किये हरिहोय ॥

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६७
गुरुही के परताप सों, मिटै जगत की व्याध ।
राग दोष दुख ना रहै, उपजै प्रेम अगाध ॥
गुरुके चरणन में धरो, चित बुधि मन अहंकार ।
जब कछुआपा ना रहै, उतरै सबही भार ॥
मन विरक्त के करन को, कीन्हो गुटका सार ।
पढ़ै सुनै चितमें धरै, भवसागर हो पार ॥
इति श्रीचरणदासकृतमनविरक्तकरणगुटकासारसम्पूर्णम् ॥
अथ श्रीस्वामीचरणदासजीकृत
ब्रह्मज्ञानसागरप्रारम्भः ॥
००००००००
दो० जैसे हैं शुकदेव जी, जानत सब संसार ।
भगवत मत परगट कियो, जीव किये बहु पार ॥
तिन मोपै किरपा करी, दियो ज्ञान विज्ञान ।
सो सिप तुमसों कहतहौं, छूटै सब अज्ञान ॥
शिष्य सुनौ अब कहतहौं, परम पुरातन¹ ज्ञान ।
निगुरै² को नहिं दीजियो, ताके तपकी हान ॥
कुण्डलिया ॥
मोक्ष मुक्ति तुम चहतहौ तजौ कामना काम ।
मनकी इच्छा मेटकरि भजौ निरंजन नाम ॥
भजौ निरंजन तत्त्व देह अध्यास मिटावो ।
पंचनके तज स्वाद आपमें आप समावो ॥
जब छूटे झूठी देह जैसेके तैसे रहिया ।
चरणदास यही मुक्ति गुरूने हमसे कहिया ॥
१ पुराना २ जो किसी का मन्त्र न लियेहो ॥

२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्वान।
नित न्यारो तू देहसों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवना, भक्षण करन अहार।
दुख सुख मैथुन रोग सब, गर्मी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नांव।
उपज विनशै देह सों, पांच तत्त्वको गांव ॥
पावक पानी वायु है, धरती अरु आकास।
पांचतत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुण तीनों हैं साथ।
घट उपाधि सों जानिये, करत रहें उतपात ॥
तामस अरु हिंसा १ करै, वचन चलन विपरीति।
आलस अरु निन्दाकरै, तामसगुण की रीति ॥
डिंभ कपट छल छिद्र बहु, खोटे सब व्यवहार।
झूठ वचन ऐंठो रहै, तामस के गुण धार ॥
मान बड़ाई नामना, सिद्धि चहैं भजि राम।
भोजन नाना स्वादके, राजसगुण के काम ॥
खेल तमाशे राजसी, अरु सुगन्धकी वास।
आपनको ऊंचों गिनै, औरनकी कर हास ॥
दया क्षमा आधीनता, शीतल हिरदय धाम।
सत्य वचन गुण सात्त्विकी, भजन धर्म निहकाम ॥
दुखी न काहू कों करै, दुख सुख निकट न जाय।
समदृष्टी धीरज सदा, गुण सात्त्विकको पाय ॥
१ मारना ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । २६६
राजस सों तामस बढ़ै, तामस सों बुधि नास।
रजगुण तमगुण छांड़िकै, करो सतोगुण वास ॥
सतगुणमें मन थिरकरो, करि आतम सों नेह।
आतम निर्गुण जानिये, गुण इन्द्री सँगदेह ॥
सात्त्विक राजस तामसी, त्रैगुण ते संसार।
तीन पांचको नाशहै, माया ब्रह्म विचार ॥
अहंतत्त्व ॐ भयो, जिनते तीनौ देव।
जिनके परे जु आतमा१, अगम अगोचर२ भेव ॥
उपजै सो माया सभी, विनशि नेकमें जाय।
छल मायासों कहतहैं, सपनो सकल बिहाय ॥
निराकार३ अद्वै अचल४, निर्वासी५ तू जीव।
निरालम्ब६ निर्वैर सो, अज७ अविनाशी सीव ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभकी८ इन्द्री कान।
नासा इन्द्री धरणिकी, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचासो इन्द्री वायुकी, पावक इन्द्री नैन।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय।
चरणदास पांचौ कही, अग्नितत्त्वसों जोय ॥
रक्त बिन्दु कफ तीसरो, मेद मूत्रको जान।
चरणदास प्रकृति यह, पानीसों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहौं, रोमजान अरु मांस।
पृथिवीकी प्रकृति यह, अन्त सबनको नास ॥
१ सच्चिदानन्दस्वरूपी यस्तिष्ठति स आत्मा २ जो दृष्टि में न आवै
३ जिसका आकार नहीं है ४ जो चल न सकै ५ जिसका कहीं वास नहीं
६ जिसको किसी वस्तुकी चाह नहीं ७ जो जन्म नहीं लेता ८ आकाश ॥

३०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बलकरना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भय, तत्त्व आकाश को भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
रोम गगन नाड़ी पवन, मांस अग्नि को अंश ।
त्वचा नीर सौं जानिये, अस्थि¹ मही को वंश ॥
कफ आकाश बिंदु वायुसों, रक्त अग्निसों बूझ ।
मूत्र नीर रणजीत भन, मेद महीसों सूझ ॥
नीर व्योमसपरशँ² पवन, आलस अग्नि पिछान ।
ध्यास नीर रणजीतमन, भूख महीसों जान ॥
उठना तौ आकाश सों, बल करना है वाय ।
बढ़नि अग्निधावन उदक³, संकोचन महिआय ॥
लोभ जु नभकाअंशहै, काम वायुका भाग ।
क्रोध अग्नि जल मोहहै, भय पृथ्वीका लाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकार निर्लिप्त तू, देही जान अकार ।
आपन देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशी नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
जरा मरण धर्म देह को, भूख प्यास धर्म प्रान ।
सकल विकलमन जानिये, स्वाद सुइंद्री जान ॥
१ हाड़ २ छूना ३ जल ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०१
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान हैं, जानै संत सुजान ॥
जो जो इनसों जानिये, निश्चय ना ठहराय ।
कहै सुनै चाखै लखै, सो सोई मिटिजाय ॥
इन्द्री जानि सकै नहीं, मन बुधि लहै न ताय ।
ज्ञानदृष्टि पहिचानिये, वासों वाको पाय ॥
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
देह मिटत है स्वप्न ज्यौं, जीव रहत है नित्त ।
देहकर्म बिसराय करि, आतमसों करि हित्त ॥
मन जीतै इन्द्री गहै, चित्त अस्थिर जब होय ।
आतम सों परचो रहै, राखै सुरति समोय ॥
पृथ्वी काल जे ठौर है, गुदै जानिये द्वार ।
पीरो रंग पहिचानिये, पीवन खान अहार ॥
जलको वासा भाल¹ है, लिङ्ग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, रंग सफेद निहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
पवन ना²भि में रहत है, नासा जानिये द्वार ।
हरो रंगहै वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीशमें वास है, सरवन दुवारे जान ।
शब्द कुशव्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीनसों जानिये, मैं मेरी जड़मूल ॥
१ माथ २ तोंदी ॥

३०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाग्रत का अस्थूलहै, स्वप्ने लिंग शरीर ।
कारण जान सुषोपती, तुरिया साक्षी वीर ॥
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, तुरी अवस्थ विचार ।
परा पश्यन्ती मध्यमा, वैखरी -वाणी चार ॥
जाग्रत वासा नैन में, स्वप्न कण्ठ अस्थान ।
जान सुषोपत्ति हिये में, नाभि तुरिय मनतान ॥
नाभि मध्य वाणी परा, हिये पश्यन्ती सुक्ख ।
कंठ मध्यमा जानिये, कहूं वैखरी मुख्य ॥
चितबुधिमन अहंकार जो, अन्त:करण सुचार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, आतमतत्त्व विचार ॥
जलसों मन निश्चय कियो, भयो वायुसों चित्त ।
अहंकार भो अग्निसों, बुधि पृथ्वी सों मित्त ॥
शब्द स्पर्शरु गंधहै, अरु कहियत रसरूप ।
देह कर्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
शब्दा गुण आकाश का, सपरस गुण है वाय ।
पृथ्वीका गुण गंध है, सो यह प्रकट दिखाय ॥
रूप अग्निका गुण कहूं, रसगुण जलका जान ।
रणजीतबतावै खोलिकरि, ये शिष ले पहिंचान ॥
सरवन मुख इन्द्री भई, तत्त्वाकाश सों दोय ।
त्वचा हाथ इन्द्री युगल, वायुतत्त्व सों होय ॥
पावक सों इन्द्री युगल, भये नैन अरु पावँ ।
जलसों जो इन्द्री भई, लिंग रसना१ दो नावँ ॥
गुदा नासिका दो भई, पृथ्वी सों पहिंचान ।
चरणदास यों कहतहैं, एक कर्म इक ज्ञान ॥
१ जीभ ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०३
राजस सों इन्द्री भई, तामस सों तत्त्व पांच ।
सात्त्विक सों चारौ भये, चरणदास कहैं सांच ॥
तीनौ गुणसे है परे, सो आतम को रूप ।
सो वह दृष्टि न आवई, अगम अगोचर भूप ॥
दश इन्द्री तत्त पांच है, तन्मात्रा भी पांच ।
चारौ अन्तःकरण हैं, ये चौबीसौ बांच ॥
पन्द्रह कों अस्थूल है, नौको लिंग शरीर ।
कारण झीनी वासना, तुरिया निर्मल धीर ॥
जाग्रत में चौबीस हैं, स्वप्ने में नौ जान ।
सुषुप्ति में सब लीन है, ये अँग जड़के मान ॥
तुरिया इकरस आतमा, निर्मल अचल अनाद ।
घटै बढ़ै उपजै नहीं, तहां न वाद विवाद ॥
घटै बढ़े उपजै मिटै, जड़को यही स्वभाव ।
सो सब कौतुक कररही, नाना किये उपाव ॥
चेतन ज्यों को त्यों सदा, सदा अकर्त्ता जोय ।
सब कर्मन सों रहित है, आतम ऐसो होय ॥
काहू ते उपजौ नहीं, वाते भयो न कोय ।
वह न मरै मारै नहीं, राम कहावै सोय ॥
योगयुगतकरि खोजि ले, सुरतिनिरति करिचीन ।
दशप्रकार अनहद बजै, होय जहां लवलीन ॥
तीन बंध नौ नाड़िका, दश बाई को जान ।
प्राणअपान समान है, और कहत उदान ॥
व्यानवायु अरु किरकिरा, कूरम बाई जीत ।
नाग धनंजय देवदत्त, दश बाई रणजीत ॥
नवो द्वारको बंधकरि, उत्तम नाड़ी तीन ।

३०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करै परबीन ॥
करतै प्राणायाम के, पावै आतम भेख ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुंभक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगाय करि, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकै, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधिकै, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षटौ चक्रको छेद ॥
नासाध्यान दृष्टिभ्रुकुटी में, सुरति श्वासके माहिं ।
आतम देखो जातहै, यामें संशय नाहिं ॥
योगयुक्ति कै कीजिये, कै आतम को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शारीर है, ब्राह्मण और रजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास अवधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरति मिटै, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशातजौ, तजौ मान अरु थाप ।
काया मोह विकारतजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानो आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरतहौ, सो तुम आपहि आप ॥
इच्छा दुई बिसारिकै, क्यों न होय निर्वास ।
तूतो जीवन्मुक्त है, तजौ मुक्तिकी आस ॥
आपा खोजै आपलखि, आप अपनको देख ।
चरणदास तुहि ब्रह्महै, तूही पुरुष अलेख ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०५
जैसे कछुवा सिमिटिकै, आपहि माहिं समाय ।
तैसे ज्ञानी श्वासमें, रहै सुरति लवलाय ॥
सबघट रमो सो राम है, आदि पुरुष निर्गम्य ।
लखचौरासी योनिमें, एक समानो सम्य ॥
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, रूप न देखो जाय ।
बिन सूरति बिननामको, घट घट रहो समाय ॥
छप्पय ॥
इच्छा दुइकर दूर आप तू ब्रह्म ह्वै जावै ।
और सो द्वितिया कौन तासुको शीश नवावै ॥
माला तिलक वनाय पूर्व अरु पश्चिम दौरा ।
नाभि कमल कस्तूरि हिरण जंगल भो बौरा ॥
चरणदास लखि दृष्टि भरि एक शब्द भरपूरहै ।
निरखि परखिले निकटहीं कहन सुननकोदूरहै ॥
झूठी सी यह दृष्टि जगत सब झूठो दरशै ।
मूरख जानै सत्य तासुसों फिर फिर परशै ॥
चंद सूर थिर नहीं नहीं थिर पौन न पानी ।
त्रैदेवा* थिर नहीं नहीं थिर मायारानी ॥
नवनाथचौरासीसिद्धजोचरणदास थिर ना रहे ।
ब्रह्म सत्य सर्वज्ञहै आत्म विचार क्यों ना गहै ॥
दो० जो मुख सेती बोलिये, अरु सुनियत है कान ।
जो आंखिन सों देखिये, सबही माया जान ॥
एकै सबतन रमि रह्यो, चेतन जड़के माहिं ।
मायादर्शत है सभी, ब्रह्म लखतहै नाहिं ॥
जैसे तिलमें तेलहै, फूल मध्य ज्यों बास ।
*ब्रह्मा, विष्णु, महेश ॥

३०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूध मध्य ज्यों घीवहै, लकड़ी मध्य हुंतास १॥
थावर जंगम चर अचर, सबमें एकै होय ।
ज्यों मनको मैं डारि है, बाहर नाहा कोय ॥
एकडोरि मनका गुहै, अवरण वरण निहारि ।
आतम तौ निहरूप है, नित्य अनित्य विचारि ॥
माया यही स्वभावहै, उदय होय छिपि जाय ।
चंचल चपल सुहावनी, ओलं २ ज्यों गलिजाय ॥
परमातम तौ नित्यहै, ताको आदि न अन्त ।
सदाअचल चंचल नहीं, सब गुण रहत अनन्त ॥
सत चेतन आनन्दहै, आदि अन्त मधि हीन ।
आदि अन्त आकारको, सो तू झूठो चीन ॥
सुरति नाम आकारहै, ज्यों भूतनको नाच ।
मृगतृष्णाको नीर है, निकट गये नहिं सांच ॥
चितवत सांचीसी लगै, खोज किये मिटिजाय ।
दीखै है पर है नहीं, कौतुक सो दरशाय ॥
शिष्यवचन ॥
ब्रह्म बिना खाली नहीं, धरबेको इक पावँ ।
मायाको कहाँ ठौरहै, सत गुरु मोहिं बताव ॥
निर्विकार तौ ब्रह्म है, अद्वै अचल अपार ।
आई माया कहांते, सतगुरु कहौ विचार ॥
गुरुवचन ॥
आप ब्रह्म माया भयो, ज्यों जल पाला होय ।
पाला गलि पानी भयो, ऐसे नाहीं दोय ॥
झूठी माया सो कहैं, ज्ञानी पंडित लोय ।
१ अग्नि २ पत्थर ॥

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । '३०७
भर्मभूल सांची लगै, समझै सांच न होय ॥
सोने को गहनो गढ़ै, कहन सुननको दोयं ।
गहनो ना सोनो सबै, नेक जुदो नहिं होय ॥
झूठ सांच दो नावहै, झूठ मिटै इक सांच ।
नाम मिटै सूरत मिटै, भूषण को लग आंच ॥
जाको माया कहतहैं, सो तू नेक निकास ।
जैसे हींग कपूरकी, नेक जुदी कर बास ॥
जल समान तो ब्रह्महै, माया लहर समान ।
लहर सबै वह नीरहै, लहर कहै अज्ञान ॥
खेल खिलौना खांड़के, कीजै लाख पचास ।
सकल खिलौना खांड़है, ऐसे गहि विश्वास ॥
चरणदास खिलौना खांड़के, भाजन राखे खांड़ ।
बिन विनशोभी खांड़है, बिनशिजाय तौ खांड़ ॥
माटी के भांड़े भवैं, सूरति अरु बहुनाम ।
बिगसिफूटि माटी भई, बासन कहुकेहि ठाम ॥
ऐसेही माया नहीं, समझि देखु मनमाहिं ।
जो दीखै सो ब्रह्महै, रंचक माया नाहिं ॥
इच्छा मेटै दुइ तजै, एकै मन विश्राम ।
ब्रह्मज्ञान विज्ञान है, समझ परमपद धाम ॥
सवैया ॥
श्वास उसास चलै जप आपहि है जु अखण्ड टरै नहिं टारो ।
भीतर बाहर है भरपूरि सों ढूंढ़ौं कहां नहिं नाहिंन न्यारो ॥
चरणदास कहैं गुरुभेद दियो भ्रम दूरि भयो जुहुतो अतिभारो ।
दृष्टि अदृष्टि जु रामको देखत राम भयो पुनि देखनहारो ॥
दो० आप आपमें आपहै, खेलौ बहु विस्तार ।