भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परो जाल के माहिं बहुत दुख मानिकै ।
चारौ गहिलै चलो वधिक सुख जानिकै ॥
राजा मो मनहुतीं जु सुत दाराकरूं ।
निरखिलई यह सीख बहुरि नहिं चितधरूं ॥
वाकौ कीन्ह्यो गुरू चरित यह देखिकै ।
हरि सुमिरण से पगोरहूं जु विशेषिकै ॥
मोह महादुखरूप सकल बिसराइया ।
लिये रहूं वैराग परमसुख पाइया ॥
सदा रहूं निर्बंध दुःख सब भाजिया ।
चरण कमलको ध्यान हियेमें साजिया ॥
तहां बसौं निशिभोर अंत नहीं बहूं ।
चरणहिंदासा होयकै निज आनँद लहूं ॥
दो० नवां गुरू अजगरकियो, लियो परम संतोष ।
परलब्ध दृढ़ करि गही, रहा राग नहिं दोष ॥
अष्टपदी
जिहि कारण गुरु कियो कहूँ कारण सभी ।
जासों रहौं दृढ़बैठि भयो धीरज तभी ॥
आगे भिक्षा काज ध्यान तजि डोलतो ।
कोऊ देतो भीख कोउ दुर्बोलतो ॥
जो कोउ भोजन दियो मगन होतो तहां ।
जो कोउ नाहीं दियो क्रोध करतो तहां ॥
अजगर इकदिन लखो जहां उतपति भयो ।
निशिदिन ठांईं रह्यो कहूं नाहीं गयो ॥
आंय अचानक मृगा सिंह वा मुख धँसै ।
चौपाये यौं आय तासु मुखमें फँसै ॥