भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८५
वाने दीन्हीं नहिं क्रोध उपजाइया ॥
वाते कीन्हों वैर अधिक रिस ठानिया ।
नारायणके ध्यान सुरति नहिं आनिया ॥
यह शिक्षा लइ मानि पिंगलासे तभी ।
जगकी छोड़ी आश भये कारज सभी ॥
दो० चील्ह अठरहों गुरु कियो, मिटो सकल सन्देह ।
रहौं अकेलो संग तजि, करौं न कछु संग्रह ॥
अष्टपदी ॥
जब गृहसेती निकसि वैरागी हम भये ।
तब हमरे मनमाहिं जु ये कारज छये ॥
दो भाजन सँग होहिं एक जल पीजिये ।
दूजे भाजन माहिं खानको लीजिये ॥
इक चादर कोपीन दोय यह चाहिये ।
ताते ओढ़ि नहान किं युक्ति बनाइये ॥
करिकै जब अस्नान ध्यान करने लगो ।
मनमें चिन्ता कोऊ कोपीनहिं लै भगो ॥
समझो यह मनमाहिं बहुत अधिकारते ।
अन्त महादुख होय मोह उरधार ते ॥
ऊंची पदवी पाय बहुरि नीचे परै ।
जब वह संपत जाय घनो मनमें झुरै ॥
जो कोइ रहै इकन्त अकेलोई सहै ।
ताहि उदर को शोच कछू नाहीं रहै ॥
दशबिस सौ जो साथ अधिक दुख लहत है ।
आप अकेलो रहै परमसुख सहत है ॥