भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८७
लोभ जु वामें नाहिं रहै अनजानहूं ॥
मारै कोई वाहि रोष वह ना करै ।
करै जु फिरि वह प्यार बाल हँसि हँसि परै ॥
निन्दा अस्तुति दोय कभी नहिं धारई ।
वैर प्रीतिको अङ्ग कछू न विचारई ॥
जो मणि बहुतै मोल कि वासे लीजिये ।
खेल खिलौना फूलको पलटे दीजिये ॥
मणिको लोभ न करत कछू नहिं भाषई ।
चितको अपने खेलके माहीं राखई ॥
जो कोउ नारी पकरि हिये सों लागई ।
बालक अरु वा नारिको काम न जागई ॥
नग्न जु बालक फिरत लाज नहिं आवई ।
ज्यों भावै त्यों रहै कोई न चलावई ॥
क्रिया कर्म अरु सकुच कछू वाके नहीं ।
ठाकुर अरु चरणदास कछू जानै नहीं ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जी, राजासों यह बैन ।
इकदिन बालक की सबै, देखी अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय बालगति देखिकै ।
वाकेलिये स्वभाव सभी जु विशेषिकै ॥
जो कहुँ हमसों प्रीति बहुत आदर कियो ।
काहूं गारी काढ़ि बहुत झड़को दियो ॥
दोनों एक समान और नहिं व्यापई ।
बैठूं सहज स्वभाव उठूं फिर आपई ॥
जो किन्हूं भोजन दियो चाटिहाई लियो ।