सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 326

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८७
लोभ जु वामें नाहिं रहै अनजानहूं ॥
मारै कोई वाहि रोष वह ना करै ।
करै जु फिरि वह प्यार बाल हँसि हँसि परै ॥
निन्दा अस्तुति दोय कभी नहिं धारई ।
वैर प्रीतिको अङ्ग कछू न विचारई ॥
जो मणि बहुतै मोल कि वासे लीजिये ।
खेल खिलौना फूलको पलटे दीजिये ॥
मणिको लोभ न करत कछू नहिं भाषई ।
चितको अपने खेलके माहीं राखई ॥
जो कोउ नारी पकरि हिये सों लागई ।
बालक अरु वा नारिको काम न जागई ॥
नग्न जु बालक फिरत लाज नहिं आवई ।
ज्यों भावै त्यों रहै कोई न चलावई ॥
क्रिया कर्म अरु सकुच कछू वाके नहीं ।
ठाकुर अरु चरणदास कछू जानै नहीं ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जी, राजासों यह बैन ।
इकदिन बालक की सबै, देखी अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय बालगति देखिकै ।
वाकेलिये स्वभाव सभी जु विशेषिकै ॥
जो कहुँ हमसों प्रीति बहुत आदर कियो ।
काहूं गारी काढ़ि बहुत झड़को दियो ॥
दोनों एक समान और नहिं व्यापई ।
बैठूं सहज स्वभाव उठूं फिर आपई ॥
जो किन्हूं भोजन दियो चाटिहाई लियो ।