भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन २८१
काया आलस धारि जु घर भीतर गई ।
पलका बैठी जाय जहां भलि सेजही ॥
बिछे बिछौना श्वेत फूल तापर धरे ।
लेटी तहां मग जोय नैन निद्राभरे ॥
कबहूं उठिजा द्वार कभूं जा भीतरै ।
कहै चरणहींदास नींद नाहीं परै ॥
दो० आशाकी डोरी बँधी, क्षण घर में क्षण द्वार ।
थिरताना संतोषबिन, दुखी पिंगलानार ॥
अष्टपदी ॥
ऐसे आधीराति गई जब बीति कै ।
कोऊ आयो नाहिं सुहां कछु प्रीतिकै ॥
पिंगला उपजो ज्ञान हिये परकाशही ।
उदयभयो संतोष लोभ गयो नाशही ॥
वर्ष सहसदश माहिं जु तप कोऊ करै ।
हिरदै निर्मल होय सभी कलिमल हरै ॥
ऐसो ज्ञान उजास पिंगला को भयो ।
तब उन हिरदै माहिं वचन ऐसो कह्यो ॥
हीन हमारे भाग जन्म योंहीं गयो ।
मनुष रूपसों काम क्रोध लोभै छयो ॥
ताते जिविका आप हिये में चाहिया ।
परमातम भगवान सों प्रीति न लाइया ॥
सदा विराजत निकट दूरि नहिं होतहै ।
सबविधि पूरणकाम सकल जग ज्योतिहै ॥
सबहीको नित देतु खान अरु पानई ।
चरणहिंदासा होय सोई यह जानई ॥