भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० करि विचार मनमें धरी, धन्यभाग सुख होय ।
हम समान या जगतमें, और न दीखै कोय ॥
अष्टपदी ॥
भयो कपोतिनि गर्भ अण्ड द्वै वा दिये ।
प्रीतिसों सेवन किये फूटि द्वै सुत भये ॥
केतक दिवसन माहिं पंख निकसे सभी ।
उड़िकै बैठन लगे डार ऊपर तभी ॥
निरखत बहुसुख मानि कपोत कपोतिनी ।
हमरे अति बड़भाग दियो यह सुख धनी ॥
एक रहे घर माहिं जु रक्षा धारने ।
दूजे वन में जाय जीविका कारने ॥
बनसे चूगालाय बचन मुखं डारई ।
बाते उनकी क्षुधा सकल निरवारई ॥
जन्म सुफल मन जानि रैनदिन यों रहै ।
वसुधामें कछु शोच न हियमाहीं लहै ।
इकदिन कह्योकपोत कपोतिनि साथही ।
ये बच्चा अब बड़े भये सब गातही ॥
एतौ रहैं गृहमाहिं दोऊ हम वन चलें ।
चूगा लावैं बहुत करैं भोजन भलैं ॥
है करि निस्संदेह दोऊ वन को चले ।
कहैं चरणहींदास चुगन लागे भले ॥
दो० पाछे बधिक जु आइया, दीनो जाल बिछाय ।
पकरन की मनमें करी, बैठ्यो घात लगाय ॥