भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अतिही है बलवन्त करें औगुण तहां ॥
षटरसही के स्वाद सों नारी वशभये ।
जग माहीं दुखपाय मुये नरकैगये ॥
मन्में देखि विचारि गुरू कियो मीनहूं ।
जासों लीनी सीख इन्द्रिभइ क्षीनहूं ॥
सबही स्वाद भुलाय शरण हरिकी लई ।
चरणहिंदासा होय सुरति निर्मल भई ॥
दो० सत्रहवों गुरु पिंगला, लीन्हों जासों ज्ञान ।
आशातजिनिर्मलभयो, लगो रहूं हरिध्यान ॥
अष्टपदी ॥
गुरु सत्रहवों जान हमारो पिंगला ।
पर आशा दइ छांड़ि रहूं आनँद मिला ॥
इक दिन राजा जनक विदेही के नगर ।
गयो अचानक लख्यो पिंगला को बगर ॥
पिंगला उठि परभात भली विधि न्हाइया ।
भूषण बस्तर पहिरि सुगन्ध लगाइया ॥
घरके द्वारे बैठि जु बाट निहारई ।
कोऊ दे बहु द्रव्य सु ह्वां पग धारई ॥
मारग में नर देखि यही आशा करै ।
आवतजानै ताहि खुशी हियमें धरै ॥
जब वह आयो नाहिं दुखी मनमें भई ।
कबहूं आश निराश ऐसही निशि अई ॥
ऐसे सब दिन बीतिगयो यहि भांतिही ।
मनमें भई मलीन आइ पुनि रातिही ॥