भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७७
अंकुश शिरके माहि जु बेड़ी पायँकै ॥
शीश धुनै पछिताय वै आनँद कितगये ।
जो सुख वनके माहिं सभी स्वप्ना भये ॥
सदाहुतो निर्बन्ध आय बंधन बँधो ।
कहैं चरणहींदास काम फंदन फँधो ॥
दो० सपरशकी इच्छा किये, भया जु ऐसा हाल ।
पशु पक्षी नर नारिही, फँसे कामके जाल ॥
अष्टपदी ॥
भाषत दत्तात्रेय जु साधूजन कभी ।
कामिनि ओर निहारि करै सपरश तभी ॥
हस्ती कैसो हाल साधुको होय है ।
सुमिरण ज्ञानरुध्यान जु सबही खोय है ॥
जो कहै हमहैं साधु जु कोई भार्या ।
चूमै हमरे चरण तासु होयहै कहा ॥
चरणन चूमै आय हाथ धरि पायँ पै ।
साधूमन चलिजाय स्पर्श सुख पायकै ॥
वाको सुख उरधारि करै इक कामिनी ।
वाते पुत्र कलत्र बहुतही यामिनी ॥
वनमें तप अरु योग जु करतो निशदिना ।
सो सबही गयो भूलि नहीं सुख इकछना ॥
ताते हस्ती गुरू हिये में धारिया ।
कामिनि को परसंग सकल निवारिया ॥
काठ कि पुतली होय कै कागज में रंची ।
चरणहिंदासाहोय सोभी देखन तजी ॥
॥७३॥