भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७५
सूक्ष्म सबही पुष्पसों उन रस मांगही ॥
तब में कियो विचार इकट्ठो लेनते ।
देनहार को दुःख बहुतही होत है ॥
नेक नेकही लेहु बहुत घरजायकै ।
उदर पूरणा करूं जु आनंद पायकै ॥
जितना होय अहार सोई अब लेत हौं ।
वासी नेक न राखि न काहू देत हौं ॥
अलिसुतकी यह रीति भूखभरि खावई ।
और दिना के काज न नेक वचावई ॥
फूलन को रस चाटि नहीं उनसों बँधै ।
ऐसे विरक्त रूप जगत में ना फँधै ॥
चरणहिंदासा होय त्याग मन राखई ।
राजा सों इहिभांति ऋषीश्वर भाखई ॥
दो० देखि दशा माँखीनकी, तजो सकल संग्रह ।
मिटिदुविधा निर्भयहुये, भई सुखारी देह ॥
अष्टपदी ॥
तेरह सहतकी माँखी ताहि पिछानियाँ ।
सब वृक्षनको मीठो इकठाँ आनियाँ ॥
जब छत्ता भयो पूर किसीने तोरिया ।
सब रस लीन्हो काढिकै वाहि मरोरिया ॥
बहुत भयो उन कष्ट जुवै भागी फिरीं ।
बहुत मरीं वहि ठावँ बहुत सिसकैं गिरीं ॥
ताते माँखी गुरू हिये माहीं धरो ।
कोउ जगकी वस्तुको संग्रह ना करो ॥