भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिंदासा होय भक्ति दृढ़करि गही ॥
दो० दशवें गुरु कियो सिन्धुको, कहूँ सोई परसंग ।
लीन्हे समझ बिचारिकै, जाके तीनों अंग ॥
अष्टपदी ॥
खारी नीर स्वभाव सदा इक रस वही ।
मीठी सरिता बहुत चली आवै बही ॥
मिलि नहिं फिरै स्वभाव तासु को जानिये ।
ऐसे विरकतरहै जगत में मानिये ॥
बहुतै होय गँभीर थाह नहिं पावई ।
ऐसा साधू जानि राम मन भावई ॥
वर्षाऋतुकी नदी रलैं बहु वादसों ।
घटै बढ़ वह नाहिं रहै मर्यादसों ॥
एकादश जो पतंग कहूँ मैं सुनायकै ।
देखि दीपकी ज्योति गिरैहै आयकै ॥
दीन्हो आप जराय हाथ कछु ना लगो ।
समुझि कामिनी रूप सो मैं दूरीभगो ॥
ज्ञान जाय अरु नरकपरै इस रीति को
सुन्दररूप निहारि करो मत प्रीति को ॥
दो० फूल फूलपर बैठिकै, उदर भरै तिस नाल ।
सो भवँरा गुरु बारवां, लई जू वाकी चाल ॥
अष्टपदी ॥
भिक्षा कारण मांगन घर घर जात हो ।
कोऊ देते आनि कोऊ जु रिसात हो ॥
ताते शिक्षा भवँर कि यह उरमें लही ।