सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

२७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिंदासा होय भक्ति दृढ़करि गही ॥
दो० दशवें गुरु कियो सिन्धुको, कहूँ सोई परसंग ।
लीन्हे समझ बिचारिकै, जाके तीनों अंग ॥
अष्टपदी ॥
खारी नीर स्वभाव सदा इक रस वही ।
मीठी सरिता बहुत चली आवै बही ॥
मिलि नहिं फिरै स्वभाव तासु को जानिये ।
ऐसे विरकतरहै जगत में मानिये ॥
बहुतै होय गँभीर थाह नहिं पावई ।
ऐसा साधू जानि राम मन भावई ॥
वर्षाऋतुकी नदी रलैं बहु वादसों ।
घटै बढ़ वह नाहिं रहै मर्यादसों ॥
एकादश जो पतंग कहूँ मैं सुनायकै ।
देखि दीपकी ज्योति गिरैहै आयकै ॥
दीन्हो आप जराय हाथ कछु ना लगो ।
समुझि कामिनी रूप सो मैं दूरीभगो ॥
ज्ञान जाय अरु नरकपरै इस रीति को
सुन्दररूप निहारि करो मत प्रीति को ॥
दो० फूल फूलपर बैठिकै, उदर भरै तिस नाल ।
सो भवँरा गुरु बारवां, लई जू वाकी चाल ॥
अष्टपदी ॥
भिक्षा कारण मांगन घर घर जात हो ।
कोऊ देते आनि कोऊ जु रिसात हो ॥
ताते शिक्षा भवँर कि यह उरमें लही ।