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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 690 में से

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पृष्ठ 308

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै ।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है ॥
मोह न कवहूँ करै जु कोई कछु चहै ।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै ॥
दो० लेते कछु हरषै नहीं, देते दुख नहिं होय ।
ऐसे निलोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है ।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवैंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥