भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । २१७
दग्ध वासना होय जब, आवागमन नशाय ।
कहें गुरू शुकदेवजी, मुक्तरूप है जाय ॥
मनके सगरे भेदही, जाको दियो जिताव ।
चरणदास अब कहत हैं, झूठ सांच को न्याव ॥
जो कोइ बोलै झूठही, ताकूं लागै पाप ।
जन्म जन्म छूट नहीं, दुखदे तीनौ ताप१ ॥
बोल झूठ महा अपराधी । धरम लुटै उठिलागै बाधी ॥
झूठा सौ सौ सौगँद खाय । झूठा लेवै कर्म लगाय ॥
झूठा करै बिराना बुरा । झूठा रहै जक्त में गिरा ॥
झूठे की परतीति न होई । झूठा बोल न बोलै कोई ॥
झूठा हरिकी भक्ति न पावै । झूठा घोर कुण्ड में जावै ॥
झूठेकूं लागै यम मार । झूठा चौरासी में ख्वार ॥
झूठ वचन का भारी दोष । झूठे की होय गती न मोष ॥
झूठे के नहिं गुरू न राम । झूठेकूं नाहीं विश्राम ॥
चरणदास शुकदेव बताव । झूठे सबी नरककूं जावें ॥
दो० झूठे के मुँह दीजिये, नौसादर का वाप ।
डरा करै सकुचा रहै, वह शरमिंदा आप ॥
झूठेकूं हत्यारा जानौ । झूठेकूं ठग चोर पिछानौ ॥
झूठा कुटिल शराबी होय । झूठा कहिये कामी सोय ॥
झूठेही को जानो ज्वारी । समझि देखि सबही नर नारी ॥
सकल ऐब झूठ में पाऊं । एक एक क्या खोल दिखाऊं ॥
पांचौ खोंट सबन के राजा । सो मैं कहे चितावन काजा ॥
झूठ पाप की कहिये खानि । सो यह करै पुण्यकी हानि ॥
सबही अवगुण झूठे माहीं । चरणदास शुकदेव बताहीं ॥
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥
२१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० सांच बिना साधू नहीं, कबहुं न मिलिहैं राम ।
सांच बिना गतिनालहै, पावै ना निजधाम ॥
सत सतमुखसूं बोलिये, सतही चलिये चाल ।
सतही मनमें राखिये, सतही रहिये नाल ॥
सांचे कूं ग्रह ना लगै, सांचे कूं नहिं दाग ।
सांचे शाप न लागई, सब दुख जावै भाग ॥
बड़ी तपस्या सांच है, बड़ा बरत है सांच ।
जासों पाप सभी जरैं, लगै न गर्मको आंच ॥
जाका वचन मुड़ै नहीं, सांचे सब व्यवहार ।
चरणदास त्रयलोक में, कभी न आवै हार ॥
सांचे के मनहीं में राम । सांचा करै न छल के काम ॥
सांचा होकर सुमिरण करै । आप तरै औरन लै तरै ॥
सतवादी की पति है सांच । ताकूं लगै न दिव की आंच ॥
सांचे चोर चुराया घोड़ा । परमेश्वर ताका रँग मोड़ा ॥
और चोर चोरीसूं गया । सांच प्रताप अचम्भा भया ॥
औरे सांच प्रताप अनन्ता । सबही जानै साधू सन्ता ॥
लाख बातका एकहि जोड़ । सांचा पुरुष सबन शिरमोड़ ।
आवै सांच परम सुख पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० सांचे की पदवी बड़ी, दुष्ट साध के माहिं ।
दोनों अस्तुतिही करें, निन्दक कोई नाहि ॥
गुरू कहै सो कीजिये, करै सो कीजै नाहिं ।
चरणदास की सीखसुन, यही राखि मनमाहिं ॥
कथा सुनी ब्रतहू किये, तीरथ किये अघाय ।
गुरुमुख के होये विना, जप तप निर्फल जाय ॥
अब गुरुमुख के लक्षण गाऊं, जुदे जुदे करि सब समझाऊं ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१६
इन कूं समझ धरै हिय कोई । पूरा गुरुमुख कहिये सोई ॥
प्रथमहिं गुरुसों झूठ न बोलै । खोटी खरी करै सब खोलै ॥
दूजे गुरुको पयं¹ न लगावै । निश्चय गुरुके चरण मनावै ॥
तीजे आज्ञाकारी जानौ । इन लक्षण गुरुमुखी पिछानौ ॥
जो कोई गुरुका लेवै नाम । ताको निहुरि करै परणाम ॥
जो कहुं देखै गुरुका बाना । जाकूं जानै गुरू समाना ॥
चरणदास शुकदेव बखानै । गुरुभाई कूं गुरुसम जानै ॥
दो० गुरुभाई कूं पूजिये, धरिये चरणन शीश ।
चरणोदक² फिरिलीजिये, गुरुमत बिश्वाबीश ॥
जो कहुं गुरुका बस्तर पावै । हिये लगाय चूम दृगल्यावै ॥
गुरू देश का मानुष आवै । दै परिक्रमा बलि बलि जावै ॥
कहै दया करि दर्शन दीन्हें । मेरे पाप भये सब क्षीन्हे ॥
जो अपने गुरुद्वारे जइये । देखत पौरि बहुत हरषइये ॥
हांईं सूँ दण्डवत जु कीजै । दर्शन करिकरि सर्वस दीजै ॥
फिर ठाढ़ो रहै जोरे हाथा । बैठे तब आज्ञा दे नाथा ॥
जो बोलैं सो मन में धरिये । अपने अवगुण सबही हरिये ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा गुरुमुख राम रिझावै ॥
दो० साधुन की निंदा बुरी, मत कोइ कीजो भूल ।
दुनिया में दुख पायहैं, रहैं नरक में झूल ॥
साधुका निन्दक तन मन दुखी । साधुका निन्दक होय न सुखी ॥
निन्दक साधु दरिद्री होय । निंदक डारै सर्वस खोय ॥
साधुका निंदक नरक मँझार । निश्चय खावै यमकी मार ॥
साधुका निंदक पूरा पापी । साधुका निंदक डूबै आपी ॥
मूरख होय सो निन्दा करै । साधु संत कूं अवगुण धर ॥
१ किसी प्रकार का झूठा दोष २ चरणों का धोयाहुआ जल ॥
२२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
साधुका निन्दक श्वान समान। साधुका निन्दक शूकर जान ॥
साधु रामकी कहिये देह। निन्दक के मुख माहीं खेह॥
चरणदास निन्दा तजि दीजै। भक्तोंकी अस्तुतिही कीजै ॥
दो० साधोंकी अस्तुति किये, हरिकी अस्तुति होय ।
भक्तों की निन्दा किये, प्रभुकी निन्दा सोय ॥
श्रीनिकुंजविहारिणे नमः ॥
अथ श्रीशुकदेव मुनिराज महाप्रभु के शिष्य श्रीश्यामचरणदास
जी महाराज रचित वेदस्तुति लिख्यते ॥
दो० भक्ति पदारथ कारने, देहुं वेद की साख ।
ताको भेद मिलाइये, चरणदास कहैं भाख ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सों, कहूं वेद को वाक ।
संस्कृत भाषा करी, आदि सनातन साख ॥
नारद सू नारायनहि, देव लोक सनकाद ।
शुकदेव परिक्षित सों कही, मैं कहूं सुनियो साध ॥
अष्टपदीछन्द ॥
श्री शुकदेव गुरु के बचन विचार के ।
वेद स्तुति की कथा कहूं उरधार के ॥
भक्ति प्रापत होय जक्त ब्याधा नसे ।
अंत मुक्ति पद पाय अमरपुर जा बसे ॥
श्री भागवत पुराण दस्म असकंध में ।
कही कथा सुखदान हिये के हुलास तें ॥
राजा परिक्षित कहत श्रीशुकदेव कों ।
मोहिं कहो समझाय सकल याभेव कों ॥
हरि स्तुति भलिभांति सूं वेदन गाइहैं।
निर्मल परम पुनीत सो मोमन भाइहैं ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २२१
निरगुन स्तुति अधिक जू सरगुन में कही ।
मेरे मन में समझि न आवत कछु यही ॥
बोले गुरु शुकदेव ये सुन के बात कूं ।
राजा मनचितलाय सुनों या काथ कूं ॥
हरि इच्छा सों जबहि उन्ह शिक्षा भई ।
तब अधिकारी होय स्तुति वेदन कही ॥
दो० नारायण पै जाय के, नारद चरणहि दास ।
यही बात पूछत भए, कर कर उमंग हुलास ॥
अष्टपदीछन्द ॥
हरि भक्तन के मांहि महा मुनि अति गुनी ।
एक दिवस कर चाव श्री नारद मुनी ॥
श्री नारायण पास जु वह चल कर गयो ।
दरशन उनके पाय मुदित मन में भयो ॥
नमस्कार कर जोर ऋषी ज्ञानी महा ।
नारायन सों बोल बचन ऐसे कहा ॥
स्तुति श्रीभगवान की वेदन गाई है ।
सो सब हम को आज कही समझाईए ॥
श्रीनारायण बोल वचन मुखते कहै ।
नारदसों यहि भांति वचन भाखत भये ॥
एक दिवस सनकादि ऋषी शिरमौरही ।
सुत ब्रह्मा के जान न उन सम औरही ॥
बैठ सभा के मांहि देवही लोक में ।
राजत जैसे चंद तारन संयोग में ॥
तहां चली यह बात सकल मन भांवती ।
वेदन स्तुति कही किहिं भांति सुहावती ॥
२२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चारों भैया जान सनक कूं आदि दे ।
परम पुनीत प्रवीन सकल गुन आगरे ॥
भगवत कथा सब कोऊ सुने चित लायके ।
जो पे ज्ञानी होंहिं ज्ञान को पाय के ॥
तिहि कारनही बैठ सकल आता तहां ।
बोले अति परबीन सनक इहि बिधि जहां ॥
वेदन ऐसीं भांत सूं यह स्तुति करी ।
जै जै जै तुम आदि पुरुष नित हो हरी ॥
त्यागो निद्रा जोग जागो करतार जू ।
निज माया बिस्तार सृजो संसार हू ॥
जो पै माया रहत तुम्हारे संगही ।
तुम कबहु करतार जु वाके बस नहीं ॥
खोटी अधम जो नारि कहीं कोई होत है ।
अपने पति को दोष लगावत है वहै ॥
यह कारन मन लाय के माया परिहरो ।
जग सिरजन के काज आप आज्ञा करो ॥
तुम तिरबिधि भगवान रहत ब्रह्माण्ड में ।
प्रथम सूक्ष्म प्रान रहत है पिण्ड में ॥
दुतिय रूप
भक्तिपदार्थवर्णन । २२३
घटो बढ़ो तुम नाहिं सदा पूरन रहो ॥
आदि अंत सब सृष्टि के पुरुष अनन्त जू ।
नितही इकरस रहत तुमही भगवंत जू ॥
जो तुम ऐसी भांति कहो हरि देव जू ।
हमसो उत्पति भई तुम्हारी भेव जू ॥
तुमतो कैसी भांति हमें पहचानई ।
स्तुति ऐसी भांति कैसे के बखानई ॥
दो० ऐसी बुद्धि हमरी भई, तुम्हरे ही परताप ।
हम तो चरणहिं दास हैं, तुमही करता आप ॥
अष्टपदीछन्द ॥
यह सब किरपा नाथ तुम्हारी जानियै ।
ना तो केतिक बुद्धि हमारी मानियै ॥
तुमही सगरी सृष्टि के कारन रूप हो ।
तुम उपजावन पालन मारन रूप हो ॥
ज्यों घट नाना भाँति यों ही संसार है ।
फूटे मांटी होय सभी यों विचार है ॥
ऐसेही इक ब्रह्म सकल व्यापक सदा ।
नाम अनेक कहाय हम बरने कहा ॥
निराकार निरलिप निरगुन करतार हो ।
अपने भक्तन हेत लेत अवतार हो ॥
तुमरी लीला नाथ जो परम सुहाई ।
जो जन कहै और सुनै हिये में लावई ॥
ते जन लहत पुनीत जो पद निरबान कूं ।
अंतकाल तुम्हें मिलत जो ऐसे ज्ञान सूं ॥
तुमरी भक्ति अनन्य जो कोई जन करै ।
ज्ञानस्वरोदय, मनविरक्तकरण एवं धर्मजहाज ग्रन्थ
२२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जन्म सुफल तिहि होय मुक्ति पर पग धरै ॥
प्रेम मगन ज्यों साधु तेरो गुन गावईं ।
होय सु महाप्रसाद प्रीति सों पावईं ॥
जोगेश्वर चित लाय जू तुमकूं ध्यावईं ।
प्रान वायु कूं खैंच त्रिकुटी लावईं ॥
हृदय कमल के मांह तुमहि कूं देखई ।
अद्भुत रूप सरूप अनूपम पेखई ॥
अगम पंथ भगवान तुम्हारो जानिये ।
कहन शक्त परमान कोउ हिय आनिये ॥
अगम पंथ इह भांति तुम्हारो नाथ जू ।
पहुँच सके किहिं भांति सुनो यह बात जू ॥
भक्ति तुम्हारी नाथ स्मृति वरनन करैं ।
पावैं इस विधि तोंहि प्रीति तुमसों करैं ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप हिये में धारई ।
चार पदारथ संत कबहु चाहत नहीं ॥
ऐसे लक्षन होहिं तुम्हारे भक्त के ।
अंतर प्रेम अगाध बाहर जड़ रूप से ॥
मन के मांहीं ध्यान तुम्हारो ही बसे ।
कबहुँ रोव आप कबहु आपहि हंसे ॥
हंसत तुम्हारे ध्यान बहु हरखाय के ।
देख दशा संसार रोवे पछताय, के ॥
कबहु मगन मन होय ध्यान दृढ़ कर गहै ।
साजे तुम्हरी भक्ति जहां चित्त दे रहै ॥
बिना भक्ति कुछ और न जिय में जानई ।
बिरले ऐसे कोय जक्त में मानई ॥
भक्तिपदा २२७
तुम्हरो रूप अरूप
जहाँ कर्म मन वचन
हम हूँ जो पै वेद
तो पै तुम्हरो भेव कह
तुम्हरो रूप अरूप न
पंथ तुम्हारे की देह बताय
ज्ञान भक्ति बैराग्य जु न उपजें ।
तब तुम्हरी पहिचान हिये में नीपजै ॥
दस इन्द्रिन कूँ रोक जु मन के बस करै ।
सो मन अपनी बुद्धि मांझही ले धरै ॥
जब वह अपनी बुद्धि तुम्हीं सो लावई ।
सोई जोगी होय वे साधु कहावई ॥
जो पै नाम प्रकाश तें बहु विधि संचरै ।
भक्ति बिना निर्वान को पद नाहीं लहै ॥
जो पै काल पर्यन्त जो जीवे नर कोई ।
तो भी होवे नाश ब्रह्मा के संगवही ॥
जौपै देवन मांहिं जाय के अवतरै ।
तो भी न छूटैं कर्म मुक्ति घर ना करैं ॥
बेडी लोहे की होहि सोने की जानिये ।
दौंऊ एक समान उहि विधि मानिये ॥
तुम्हरो पुरुष स्वरूप प्रगट जब होय जू ।
ब्रह्मादिक सब देव पूजत में सोय जू ॥
कर कर यज्ञ उपाय जगत के लोय हैं ।
देवन पूजा साज करत सब कोय हैं ॥
स्वर्ग लोक में जाय ताको फल पावई ।
मृत्यु लोकही मांहिं बहुरि फिर आवई ॥
...मीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
२२४ श्री...
...ंग वह निहकर्महीं जो होय है ।
जन्म...
...क पदारथ पंथ न पावत कोय है ॥
विषय भोग रस स्वाद जोई जन पर हरै ।
भक्ति जोग दृढ़ होय जहां मन लै धरै ॥
तुम बिन और न चहै गहै पर नाम को ।
लहै तुम्हारो नाम रहे विश्राम सों ॥
जो नर जग के मांहिं इन्द्रिन के बस रहै ।
कीट योनि के मांहिं जन्म सोई लहै ॥
बहुर लेत जड़ योनि मांहिं अवतारही ।
फिर आवत है पशुकी योनि मझारही ॥
तिहि पीछे नर देह वही जो पावई ।
पहिले ही वह नीच योनि में आवई ॥
बहुरो ऐसे चार चरण में अवतरै ।
ऐसे बिषई लोय बहुत भरमत फिरै ॥
माया तुम्हरी अपार सुचतुर कहावई ।
एकै रूप अनेक भांति दिखलावई ॥
विविध वरन सों होय भासे साकारही ।
उनही रच्यो सब जक्त जहां लौं आकारही ॥
वृक्ष की छाया देख सरोवर नीरही ।
छेरी मन ललचाय आई वा तीरही ॥
वह तो इतनी शक्ति कहां सों पावई ।
जासों ही वह निकट वृक्ष के आवई ॥
या विधि प्रानी सबै माया में डूबई ।
नाहीं तो वह आप काहू व्यापत नहीं ॥
माया ही के माहिं जो कोऊ जन बंधे ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २२७
चौरासी के माहिं सदा भरमत रहै ॥
जौं जन मन ते आप माया को परिहरै ।
हरि के चरनों मांहिं ले चित अपनो धरै ॥
परम भक्त जो होय जक्त के मध्य ही ।
जीवन मुक्ति को पाय कछू संशय नहीं ॥
माया ही के संग मोह उन लाइया ।
तिहि कारन नर जीव जु नाम कहाइया ॥
अहंकार के संग सों छूटत हैं जबै ।
परमातम अरु ब्रह्मरूप होवें तबै ॥
मनुष रूप को जन्म दुर्लभ जग मांहिं हैं ।
देवन हूं को कठिन परापत नाहिं है ॥
सकल देव ईहिं भांति मनोरथ नित करैं ।
मनुष जन्म को पाय के भवसागर तरैं ॥
नर शरीर को नवका समझी जानिये ।
वेद पुरानन मांहिं जु साख पिछानिये ॥
सतगुरु खेवट रूप हिये में आनिये ।
या नवकाको पार लगावन जानिये ॥
अलख ईश भगवान जो कृपा निधान है ।
भवसागर के तरन को रूप विधान है ॥
तिन के शरने आय चरणही दास हो ।
प्रेमा भक्ति अनन्य करे निरवास हो ॥
याही विधि सों पार न होवे नर कोई ।
आतम घाती जीव जान लीजे सोई ॥
पुनि चौरासी लक्ष कि योनि मझारही ।
भ्रमत रहत इहिं भांति जु बारंबारही ॥
२२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दारा सुत अरु बंधु हितू मन आनिये ।
मिथ्या सब व्यवहार जक्त को जानिये ॥
जो जन इन के मांहिं बंधे चित देवई ।
कवहूं मुक्ति न होय जन्म फिर लेवई ॥
मन वच करके प्रीति जो तुमसों साजई ।
कर्म बन्ध कट जांय मुक्ति पुर राजई ॥
तुमरे जन जे लोय जु गिरह को परहरें ।
तुम कारनही नाथ बहुत तीरथ करें ॥
जेते तीरथ होहिं गंग कूं आदि दै ।
तुम चरणोदक होय वहै तीरथ सबै ॥
तुम चरणन के ध्यान मगन निशि दिन रहें ।
तुम्हरी अमृत कथा सुनैं नित सुख लहैं ॥
इहि विधि तुमसों प्रीति सदा जु निवाहई ।
विना भक्ति वे मुक्ति कवहूँ नहिं चाहई ॥
और वस्तु की चाह कहा मन लावई ।
छिन में सबको नाश न कुछ ठहरावई ॥
उनके मनके मांहिं कछू इच्छा नहीं ।
बन में कारन कोन रहै निशि दिन वहीं ॥
तन मनहू की आप कछू उन सुधि नहीं ।
वे तो मृत्यु समान फिरें जग मांहि ही ॥
इहि विधि ऐसी भांति जु कोऊ जन रहै ।
जन्म सुफल तिहि होय जक्त में सुख लहै ॥
विमुख होहिं तुमसों जो प्रानी मूढ़ही ।
पशु समान वे लोय अज्ञानी गूढ़ही ॥
याहि जक्त के मांहिं कर्म नहिं होय जू ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २२६
का बिधि तुमरी भक्ति करें सब लोय जू ॥
जब लग तुम्हरी भक्ति हिये नहिं लावई ।
तब लग कैसी भांति मुक्ति पद पावई ॥
कीजै सबही कर्म धर्म की रीतिही ।
याही बिधि भगवान सों उपज प्रीतिही ॥
जब लग भक्ति की रीति न मन में आवई ।
तब लग कर्म की रीति न छोड़ गंवावई ॥
बिधि सों सगरे कर्म सोई नर साजई ।
अंत होय निहकर्म मुक्ति पुर राजई ॥
कर्म भक्ति को त्याग जु कोऊ जन करै ।
घोर नर्क के मांहिं सोई प्रानी परै ॥
जग में मनुष शरीर वृक्ष सम जानिये ।
तिहि ऊपर द्वै पक्षी ही पहिचानिये ॥
एक पक्षी तिही मांहिं ताको फल पावई ।
अतिही दुर्बल छीनि दृष्टि में आवई ॥
दूजो पक्षी कछु न जाको फल लहै ।
मन में अति आनन्द लसत नितही रहै ॥
वसुधा में जो भक्त तुम्हारे कहावई ।
रैन दिवस चित आप तुम्हीं सों लगावई ॥
तिनकूं सगरे देव बहुत भरमावई ।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि को लोभ दिखावई ॥
लोभ कर सिध देख निद्धि पर मन वहै ।
भक्ति पदारथ सोय जो कैसी बिधि लहै ॥
अति अद्भुत इहि भांति ब्रह्माण्ड बनाइया ।
सातही तत्त्व के संग सोई लिपटाइया ॥
२३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पहिले धरती तत्त्व हिये में आनिये ।
ताते दस गुनों नीर जीय में जानिये ॥
बहुर अग्नि अरु पवन और आकाश है ।
षष्ठम् अहम् जु तत्त्व सदा परकाश है ॥
महत्तत्त्व रोसी भांत जु चित में जनिये ।
अष्टम मायारूप सकल पहिचानिये ॥
जो नहिं होत अशक्त जक्त व्यवहार में ।
मन में तुम्हरी भक्ति धरै संसार में ॥
माया के शिर पांव जो धर के भक्तही ।
लोक तुम्हारे मांहिं जाय पहुँचत वही ॥
आदि अंत अरु मध्य संपूरण सकल में ।
घटत बढ़त तुम नाहिं कबहुँ कल विकल में ॥
प्रभु महिमा हम नाथ हिये नहीं जानईं ।
और लोक किहि भांति सोबरन बखानईं ॥
सरगुण स्तुति करि जु यह निरबानही ।
निरगुन रूप अरूप कूं कैसे बखानई ॥
या धरती के रत्न सभी गुन लीजिए ।
तो सरूप गुन सकै न गिनती कीजिए ॥
और बहुत पखंड तुम्हीं माहीं रहै ।
तिनहूँ को हम अंत कछू नाहीं लहैं ॥
तिहि कारन हम करें तुम्हें परनाम हो ।
जय जय श्री भगवान जागो सुखधाम हो ॥
वेद स्तुति इह भांति सबन मन भाइ है ।
सकल ऋषिन को भाष जु सनक सुनाई है ॥
तबै सकल ऋषि चाव सों मिल पूजा करी ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २३१
बेद स्तुति भलि भांति सो लैकर चित धरी ॥
श्री नारायण बचन कहै इस रीति सों ।
नारद श्रोता भये अधिकहीं प्रीति सों ॥
श्री नारद वह कथा सकल मनभावती ।
वेदव्यास सूं कही जु अधिक सुहावती ॥
जैसी विधि जेहि भांति जो तिन सों हम सुनी ।
वाही विधि वाही रीति सों तुम आगे भनी ॥
ऐसे कहि शुकदेव परिक्षित राजसों ।
भाषा कर मैं कही मुक्ति के काज कों ॥
सब मिलि सुनियो संत बिबेक विचारियो ।
भक्ति हिये में राख आन सब डारियो ॥
भक्ति किये बस होय जक्त करतारही ।
ब्राह्मण शुद्ररु पुरुष करो कै नारही ॥
साधु सती अरु सूर बहुत दाता भये ।
इन की नाहीं जात चरनदासा कहै ॥
यह स्तुति जो कहै सुनै चित लायकै ।
सतसंगति लहै बास जो अघहि नसायकै ॥
समझ धरै मन मांहिं मुक्ति सोई पावई ।
भवसागर दुखरूप जहां नहीं आवई ॥
दो० वेद स्तुति पूरी करी, भेद दिया गुरुदेव ।
चरनदास के शीश पै, सदा रहो शुकदेव ॥
इति श्री भाषावेदस्तुति ॥
श्रीमदाचार्य्यवर्य्य श्यामाचरणदासजी रचित संपूर्णम् शुभम् ।
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
—:०:—
३७
२३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चीर हरण लीला ॥
( पद ) पैयां लागूं मोहन प्यारे दीजे म्हारो चीर, जाड़ो
लागै छैजी म्हांने जमुना के तीर । कहां सीखे ऐसी टेव अहो
बलवीर, हम अबला ठाढ़ी नगन शरीर ॥ कदम के ऊपर बैठे
बसन चुराय, माखन लै लै खाते हम सों सौ सौ हाहा खाय ।
विनती करते अति शीश नवाय, रखिये अब लाज हमारी
हूजिये सहाय ॥ तब बोले अंतरयामी अंतर उधार, लै लै
जावो वस्त्र अपने एहो ब्रजकी नार । प्रेम की भक्ति करी तुम
सुकुमार, प्रेम के आधीन फिरों भक्तन के लार ॥ अपनो भायो
कियो प्यारे श्याम सुजान, वस्त्र देदीने सखी छाड़ी कुलकी
कान । तन मन माहीं रमें कृष्ण भगवान, प्रीति की परीक्षा
करी नंद जू के कान ॥ यशोदा को छैया श्याम भैया बलदेव,
मानलई सत्य प्रीति सखियन की सेवा । हरि की लीला कही
शुक मुनि देव, चरनदास सखि पायो निज भेव ॥
अथ श्रीशुक मुनिराज अष्टक प्रारम्यते
पोडशवर्ष किशोर मूरति श्याम वरण दिगम्बरम् ।
घूँघरवाले केश झलके शुकमुनि चरण प्रणमहं ॥
पद्म आसन उद्र त्रिवलीं चरण पंकज शोभितं ।
आजानु भुज मुसकात मुखसों शुकमुनि चरणप्रणमहं ॥
गूढ़ यंत्र विशाल उर छबि नाभि गंभीर राजितं ।
जलजलोचन सुखदनासा, शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
व्यासनंदन भक्तवंदन मोह ममत्व निकंदनं ।
काम क्रोध मद लोभ न जिन में शुकमुनि चरणप्रणामहं ॥
ब्रह्मरूप अनूप मुनिबर पराशर कुल भूषणं ।
कृष्ण चरित पुनीत वरणत शुकमुनि चरणं प्रणामहं ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद संकट मोचनं ।
प्रेम मदमाते रहें नित शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
निरालम्भ निहभर्म निशि दिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
पतितपावन भर्म नशावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परम सुन्दर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥
इति अष्टक ॥
अथ मोह छुटावन अंग वर्णन ॥
कुंडलिया ॥
भक्ति दृढ़ावनकूं कहे नानाही परसंग ।
शुकदेव कृपा सों अब कहूं मोहछुटावन अंग ॥
मोह छुटावन अंग कोई हियमाहीं धारै ।
कुटुँब जालसुं छूटि लगै हरिचरणौ लारै ॥
चरणदास यौं कहत हैं उपजै मन वैराग ।
जक्त नींदही सूं खुलै चौथे पदमें जाग ॥
दो० गुरू पूजि जग छोड़िये, भवसागर के द्वन्ध ।
साधुनकी संगति करौ, तजौ जाति कुलबन्ध ॥
बन्धु नारि सुत कुटुँब सब, यमकी फांसी जान ।
तोहिं छुटावैं रामसूँ, इनका कहा न मान ॥
खैंचि पकड़ि ह्वां राखिहैं, जहां मोह का जाल ।
जीवत दुख बहु भांतिके, मुये नरक ततकाल ॥
या प्राणीकूं ठग लगै, सकल कुटुँब परिवार ।
२३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनमें दो बलवन्त हैं, एक द्रव्य इक नार ॥
नारि किये दुख बहुत हैं, बन्धन बँधै अनेक ।
जो सुख चाहै जीवका, तिरियाकूं मत पेख ॥
द्रव्य माहिं दुख तीन हैं, यह तू निश्चय जान ।
आवत दुख राखत दुखी, जात प्राणकी हान ॥
ताते इनकी प्रीति मन, उठै तभी निरवार ।
ये दुर्जन दुख रूप हैं, ऐसो करो विचार ॥
जो कोई इनमें पगै, तिन सें छूटै राम ।
चरणदास यों कहत हैं, क्यों पावै हरिधाम ॥
हेरि फेरि धनको करत, बीतै पहर इकरात ।
तीनपहर निशिके रहैं, खोवै नारी साथ ॥
नारी के फैलाव को, दीखै ओर न छोर ।
द्रव्य माहिं तृष्णा रहै, चाहै लाख किरोर ॥
द्रव्य जोरि मरिजय जब, हो बैठे तहँ नाग ।
नारी में जो चित रहै, ह्वैहै कूकुर काग ॥
ऐसेही भरमत फिरै, लख चौरासी देह ।
कनक कामिनीकूं तजै, जबलग नाहीं नेह ॥
मूरख त्याग न करिसके, ज्ञानवन्त तजि देह ।
चौंकायल मृग ज्यों रहै, कहीं न साजै गेह ॥
जो कोइ छोड़ै कुटुंबही, ऐसी कर पहिंचान ।
जैसे छूटै बन्ध सूं, यम जोरासूं जान ॥
जीवत यम तौ कुटुंब है, घेरि घेरि दुख देय ।
ऐसे मानुष देहकूं, लूटै ही नित लेय ॥
कै ठग सबकूं जानिये, कै धाड़ी के चोर ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २३५
रणजित कहै तु देखले, लूटत हैं निशि भोर ॥
बाहर कलकल करत हैं, भीतर लावहिं लाव ।
ऐसो बांधौ खैंचकरि, छुटै हाथ नहिं पाव ॥
लाजतौंक गलमें पड़ा, ममता ,बेरी पांय ।
रसरी मूरुख नेह की, लीन्हे हाथ बँधाय ॥
डारि दियो अज्ञान में, परो परो बिललाय ।
निकसनकूं जबहीं चहै, कुतका मोह लगाय ॥
रखवारे जहँ पांच हैं, इन्द्रिन के रस जान ।
तबहीं देह भुलायकै, जो कुछ उपजै ज्ञान ॥
कुटुँब ओर इन पांच को, एक मतोही जान ।
प्राणी कूं जग में फँसा, चहै खान अरु पान ॥
ये सब स्वारथही लगें, इसका सगा न कोय ।
जो शिर मार धरणि पर, कल्प कल्प करि रोय ॥
मात पिता सुत नारि की, इनकी उलटी रीति ।
जग में देह फँसाय कै, करिकै प्रीतिहि प्रीति ॥
जैसे बधिक बिछाय कै, जाल माहिं कण डार ।
प्रीति करै पक्षी गहै, पाछे करै जु खार ॥
जैसे ठग बहु प्यार करि, भोलापनहीं देह ।
पहिले लडू खवाय कै, पाछे सरबस लेह ॥
हित सूं हिरण बुलाय कै, गोली मारै तान ।
चरणदास यों कहतहैं, ऐसे इन कूं जान ॥
जलमें बंशी डारिया, अटकाया जहाँ मास ।
मछरी जानै हित कियो, लखो न अपनो नास ॥
भोंदू यह गति ना लखी, पड़ो कुमति के फंध ।
२३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्यों की त्यों सूझी नहीं, किया मोह ने अंध ॥
सब ठग यह देखी नहीं, कपट हेत नहिं जान ।
इनही में मिलकर चलौ, समझौ ना अज्ञान ॥
अब इनके छल कहत हूँ, समझै होय उदास ।
जानै ना द्वाई रहे, कहै चरणही दास ॥
अब इनके छल कहि समझाऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
पिता कहै तुम पुत्र हमारे । बहुत भरोसे मोहिं तुम्हारे ॥
अब तुम ऐसी बिद्या पढ़ो । अपने कुल में ऊंचे चढ़ो ॥
सतसंगति में कभी न जइये । अपने घर में चित्त लगइये ॥
हम तो हैं दुनियां के क्रूते । जाति वरण में होहिं सपूते ॥
कृत्य करो पालौ सुत वाम । कथा कीरतन सूं क्या काम ॥
अब तुम ठौर हमारी हूजै । हमने किये सो तुमहूँ कीजै ॥
ऐसी बुद्धि बड़ाई दीन्ही । इनहू हिरदय में धरि लीन्ही ॥
चरणदास कहैं देखो प्यार । मुये नरक जीवितहौ ख्वार ॥
दो० पिता बुद्धि ऐसी दई, रहिये कुटुंब मंझारि ।
जो कुछ है सो जक्तमें, धन सम्पति सुत नारि ॥
हरिकी राह भुलाय करि, दोन्हो कुटुंब चिताय ।
ताते दुख जगमें घने, चौरासी भरमाय ॥
अब सुन माताहू की वातैं । अपना जान खियावै तातैं ॥
द्रव्यकाज उद्यमहीं कीजै । ला माता की गोदी दीजै ॥
करै कमाई सोई सपूता । नाहीं तौ वह पूत कपूता ॥
नारी कूं भूषण पहिनावो । सुत पुत्री को ब्याह रचावो ॥
पूजौ पित्तर देवी देवा । सकल कुटुंब की कीजै सेवा ॥
अपने कुलकोन्योति जिमावो । ताते बहुत बड़ाई पावो ॥